होर्मुज संकट के बीच LPG पर बड़ी राहत रिलायंस समेत कंपनियां बढ़ाएंगी उत्पादन
होर्मुज तनाव के बीच LPG सप्लाई पर फोकस रिलायंस बढ़ाएगी उत्पादन
नई दिल्ली: होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होने जैसी स्थिति में देश में रसोई गैस की कमी न हो, इसके लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पहली बार सरकारी और निजी रिफाइनरियों तथा अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए अधिकतम LPG उत्पादन के प्लांट-वार लक्ष्य तय किए हैं। इस व्यवस्था में सबसे बड़ी जिम्मेदारी मुकेश अंबानी की Reliance Industries की जामनगर स्थित घरेलू बाजार पर केंद्रित रिफाइनरी को मिली है, जिसे जरूरत पड़ने पर प्रतिदिन 18,000 टन तक LPG उत्पादन के लिए तैयार रहना होगा।
सरकार का यह फैसला पश्चिम एशिया में हुए संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य से LPG आपूर्ति प्रभावित होने के अनुभव के बाद आया है। भारत अपनी LPG जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और संकट से पहले देश के LPG आयात का करीब 90 प्रतिशत पश्चिम एशिया से आ रहा था। इस कारण होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर संकट पैदा होने का सीधा असर भारतीय रसोई गैस आपूर्ति पर पड़ सकता है।
13 अगस्त को जारी सरकारी आदेश के तहत देश की 21 रिफाइनरियों और अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए संयुक्त रूप से प्रतिदिन 63,810 टन तक LPG उत्पादन की क्षमता निर्धारित की गई है। यह FY26 के घरेलू LPG उत्पादन के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा क्षमता के बराबर है और देश की सामान्य दैनिक खपत के लगभग 70 प्रतिशत तक को कवर कर सकती है। इन लक्ष्यों का इस्तेमाल खासतौर पर तब किया जा सकेगा, जब आयात या घरेलू आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो।
इस पूरी व्यवस्था में रिलायंस इंडस्ट्रीज को सबसे बड़ा व्यक्तिगत लक्ष्य दिया गया है। जामनगर की 33 मिलियन टन सालाना क्षमता वाली घरेलू टैरिफ एरिया रिफाइनरी को जरूरत के समय 18,000 टन प्रतिदिन LPG उत्पादन का लक्ष्य दिया गया है। हालांकि जामनगर में ही स्थित रिलायंस की अलग 35.2 मिलियन टन सालाना क्षमता वाली एक्सपोर्ट-ओनली रिफाइनरी के लिए इस आदेश में लक्ष्य तय नहीं किया गया है।
रिलायंस के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की 18 रिफाइनरियों को संयुक्त रूप से प्रतिदिन 31,470 टन LPG उत्पादन के लिए तैयार रहने को कहा गया है। रूस की Rosneft समर्थित Nayara Energy की वाडिनार रिफाइनरी के लिए 4,480 टन प्रतिदिन का लक्ष्य तय किया गया है। वहीं ONGC और GAIL समेत अपस्ट्रीम गैस प्रोसेसरों के लिए संयुक्त रूप से 6,460 टन प्रतिदिन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
सरकार के इस कदम के पीछे भारत की आयात पर भारी निर्भरता सबसे बड़ा कारण है। FY26 में भारत ने करीब 33.2 मिलियन टन LPG की खपत की थी, जो लगभग 91 हजार टन प्रतिदिन के बराबर है। इसके मुकाबले घरेलू उत्पादन केवल 13.1 मिलियन टन यानी करीब 35,900 टन प्रतिदिन था। शेष 21.3 मिलियन टन LPG विदेशों से आयात किया गया। इस तरह देश की 64 प्रतिशत से अधिक LPG जरूरत आयात पर निर्भर थी।
होर्मुज संकट ने इसी कमजोरी को सामने ला दिया था। पश्चिम एशिया से भारत आने वाली LPG खेपों का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। मार्च में ईरान युद्ध के बाद इस मार्ग पर पैदा हुए व्यवधान ने सरकार को घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए आपात कदम उठाने पर मजबूर किया था।
उस दौरान सरकार ने रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली कुछ हाइड्रोकार्बन धाराओं को LPG उत्पादन की ओर मोड़ने के निर्देश दिए थे। औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को LPG की आपूर्ति भी शुरुआत में सीमित की गई थी ताकि घरेलू रसोई गैस उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जा सके। अब सरकार उस आपात व्यवस्था को एक अधिक स्थायी और व्यवस्थित ढांचे में बदल रही है।
नई व्यवस्था में केवल उत्पादन लक्ष्य निर्धारित नहीं किए गए हैं। कंपनियों को LPG के भंडारण, निकासी और परिवहन के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। यानी उत्पादन बढ़ाने के बाद गैस रिफाइनरी में ही न फंसी रहे, बल्कि उसे रेल और सड़क टैंकरों समेत उपलब्ध माध्यमों से देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी तैयार रखनी होगी।
सरकार ने कंपनियों से तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव सभी विकल्प तलाशने को भी कहा है। इसमें नेफ्था को LPG में बदलने जैसे विकल्प और रिफाइनरियों की Fluid Catalytic Cracking इकाइयों में तकनीकी सुधार शामिल हो सकते हैं। उद्देश्य यह है कि किसी अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान भारत कम समय में घरेलू LPG उत्पादन को अधिकतम स्तर तक पहुंचा सके।
नई व्यवस्था में केंद्र सरकार को जरूरत पड़ने पर रिफाइनरियों, तेल विपणन कंपनियों और अपस्ट्रीम उत्पादकों को निश्चित मात्रा और निश्चित अवधि के लिए LPG उत्पादन बढ़ाने का निर्देश देने का अधिकार भी होगा। इसका उद्देश्य देश में पर्याप्त उपलब्धता, समान वितरण और उपभोक्ताओं के लिए उचित कीमत सुनिश्चित करना है।
उत्पादन लक्ष्य स्थायी संख्या के रूप में जमे नहीं रहेंगे। सरकार हर छह महीने में इनकी समीक्षा करेगी। जनवरी और जुलाई में नए उत्पादन स्रोतों, नई रिफाइनरियों, गैस क्षेत्रों और तकनीकी सुधार से बढ़ी क्षमता को देखते हुए लक्ष्यों में बदलाव किया जा सकेगा। इससे समय के साथ घरेलू LPG सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की योजना है।
सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में होर्मुज या किसी दूसरे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग पर संकट आने पर भारत में घरेलू LPG उपभोक्ताओं को अचानक आपूर्ति संकट का सामना न करना पड़े। हालांकि 63,810 टन की निर्धारित अधिकतम घरेलू क्षमता देश की पूरी सामान्य मांग के बराबर नहीं है, लेकिन यह आयात बाधित होने की स्थिति में बहुत बड़ा सुरक्षा कवच बन सकती है।
इस फैसले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत में LPG करोड़ों परिवारों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा ईंधन है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के विस्तार के बाद ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के परिवारों में भी LPG का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। ऐसे में लंबे समय तक आयात बाधित होने का असर सीधे घरेलू रसोई तक पहुंच सकता है।
सरकार की रणनीति का दूसरा पहलू ऊर्जा सुरक्षा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में समुद्री मार्गों पर भारत की निर्भरता को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है, लेकिन घरेलू उत्पादन बढ़ाकर जोखिम को कम किया जा सकता है। नई उत्पादन व्यवस्था इसी दिशा में एक सुरक्षा तंत्र तैयार करने की कोशिश है।
रिलायंस को सबसे बड़ा लक्ष्य दिए जाने का कारण उसकी जामनगर रिफाइनिंग क्षमता है। देश की सबसे बड़ी निजी रिफाइनिंग कंपनियों में शामिल रिलायंस बड़े पैमाने पर पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पाद तैयार करती है। संकट की स्थिति में इसके उत्पादन प्रवाह का एक हिस्सा LPG की ओर मोड़ना घरेलू उपलब्धता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
हालांकि इसे सामान्य परिस्थितियों में हर दिन अनिवार्य रूप से 18,000 टन LPG उत्पादन करने का आदेश समझना सही नहीं होगा। ये अधिकतम उत्पादन बेंचमार्क हैं, जिन्हें आपूर्ति संकट के दौरान सक्रिय किया जा सकता है। सरकार परिस्थितियों के अनुसार कंपनियों को तय अवधि और मात्रा के लिए उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दे सकेगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला बड़ी मात्रा में तेल और गैस इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। यही वजह है कि इस इलाके में सैन्य या राजनीतिक तनाव बढ़ते ही वैश्विक ऊर्जा बाजारों में कीमतों और आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ जाती है।