नई दिल्ली। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने गुरुवार को कहा कि भारतीय निवेशकों की इक्विटी और म्यूचुअल फंड बाजार में भागीदारी तेजी से बढ़ी है, लेकिन इसका असर रिटायरमेंट के लिए की जाने वाली लंबी अवधि की बचत में उसी अनुपात में दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवार बाजार से जुड़े निवेशों को लेकर पहले से अधिक सहज हुए हैं, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में लोग अपनी बचत का पर्याप्त हिस्सा ऐसे साधनों में नहीं लगा रहे हैं, जो लंबे समय बाद रिटायरमेंट के दौरान आर्थिक सुरक्षा दे सकें।

नागेश्वरन पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी के ‘NPS दिवस 2026’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय बचतकर्ताओं में मार्केट रिस्क लेने की इच्छा बढ़ी है और इसका असर इक्विटी निवेश तथा म्यूचुअल फंड में बढ़ती भागीदारी के रूप में देखा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि निवेश व्यवहार में आया यह बदलाव सकारात्मक है, लेकिन रिटायरमेंट के लिए दीर्घकालिक वित्तीय योजना को अभी उतना महत्व नहीं मिल रहा है। निवेशकों को केवल बाजार में भागीदारी बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत वित्तीय सुरक्षा तैयार करने पर भी ध्यान देना होगा।

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत की आबादी धीरे-धीरे उम्रदराज हो रही है। आने वाले वर्षों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ेगा और ऐसे में परिवारों के लिए रिटायरमेंट के बाद नियमित आय और पर्याप्त बचत बेहद जरूरी होगी।

उन्होंने कहा कि अभी से ऐसी वित्तीय योजना बनानी होगी, जिससे लोगों को नौकरी या व्यवसाय से सक्रिय आय बंद होने के बाद भी आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े। रिटायरमेंट के बाद चिकित्सा खर्च, दैनिक जरूरतें और जीवन स्तर बनाए रखने के लिए पर्याप्त संसाधनों का होना जरूरी है।

नागेश्वरन ने कहा कि लोगों में वित्तीय बाजारों को लेकर रुचि जरूर बढ़ी है, लेकिन निवेश का समय और उद्देश्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। केवल अल्पकालिक लाभ के उद्देश्य से किया गया निवेश रिटायरमेंट सुरक्षा का विकल्प नहीं बन सकता।

उन्होंने कहा कि निवेशकों को अपनी आय का एक हिस्सा व्यवस्थित रूप से लंबी अवधि के लिए अलग रखना चाहिए। रिटायरमेंट फंड तैयार करने में निरंतरता की भूमिका अहम होती है।

नागेश्वरन ने इस बात पर भी जोर दिया कि वित्तीय बाजारों की जिम्मेदारी केवल निवेश विकल्प उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बाजार को लोगों की लंबी अवधि की बचत को ऐसी जगह पहुंचाने की जरूरत है, जहां वह उत्पादक निवेश में बदल सके।

उन्होंने कहा कि जब घरेलू बचत लंबी अवधि के लिए वित्तीय प्रणाली में आती है तो इससे अर्थव्यवस्था को भी लाभ होता है। इससे बुनियादी ढांचे, उद्योग और अन्य उत्पादक क्षेत्रों के लिए पूंजी उपलब्ध हो सकती है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार परिवारों की वित्तीय सुरक्षा और देश के आर्थिक विकास के बीच सीधा संबंध है। यदि घरों के पास मजबूत दीर्घकालिक बचत होगी तो वे भविष्य को लेकर अधिक सुरक्षित महसूस करेंगे।

उन्होंने कहा कि भारत में लंबे समय तक पारंपरिक बचत साधनों को प्राथमिकता दी जाती रही है। अब निवेशकों का रुझान शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड की ओर बढ़ा है। यह बदलाव वित्तीय जागरूकता में वृद्धि को दिखाता है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बाजार से जुड़े निवेश में जोखिम रहता है। ऐसे में निवेश का फैसला व्यक्तिगत आय, उम्र, भविष्य की जरूरत और जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

रिटायरमेंट बचत के मामले में जल्द शुरुआत करना भी महत्वपूर्ण बताया गया। यदि कोई व्यक्ति अपने कामकाजी जीवन के शुरुआती वर्षों से ही नियमित निवेश शुरू करता है तो लंबी अवधि में वह बड़ा फंड तैयार कर सकता है।

नागेश्वरन ने कहा कि वित्तीय संस्थानों को भी ऐसे उत्पाद तैयार करने होंगे, जिन्हें आम लोग आसानी से समझ सकें और लंबी अवधि तक उनमें निवेश बनाए रख सकें।

पेंशन से जुड़े उत्पादों में पारदर्शिता, सरलता और भरोसा बढ़ाना जरूरी है। इससे अधिक लोग रिटायरमेंट बचत को अपनी वित्तीय योजना का नियमित हिस्सा बना सकेंगे।

NPS जैसे दीर्घकालिक निवेश साधनों की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे उत्पादों का उद्देश्य लोगों को नौकरी के दौरान नियमित बचत के लिए प्रेरित करना और रिटायरमेंट के बाद वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है।

कार्यक्रम में नागेश्वरन ने कहा कि भारतीय परिवारों को केवल आय बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उस आय के सही प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए। बचत और निवेश के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि कम उम्र में लोग अक्सर रिटायरमेंट को बहुत दूर की घटना मानते हैं। इसी वजह से लंबी अवधि की बचत को टाल दिया जाता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ रिटायरमेंट फंड तैयार करने के लिए समय कम होता जाता है।

इसलिए वित्तीय योजना को जीवन के शुरुआती चरण से ही शामिल करना चाहिए। छोटी रकम से शुरुआत करने के बावजूद नियमित निवेश लंबे समय में महत्वपूर्ण परिणाम दे सकता है।

नागेश्वरन ने कहा कि आबादी की उम्र बढ़ने के साथ केवल सरकारी या संस्थागत सहायता पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। परिवारों को अपनी व्यक्तिगत वित्तीय सुरक्षा भी मजबूत करनी होगी।

उन्होंने वित्तीय शिक्षा की जरूरत पर भी जोर दिया। निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि इक्विटी, म्यूचुअल फंड, पेंशन और अन्य निवेश विकल्पों का उद्देश्य अलग-अलग हो सकता है।

रिटायरमेंट के लिए निवेश करते समय केवल ज्यादा रिटर्न की उम्मीद नहीं, बल्कि जोखिम प्रबंधन और लंबी अवधि की स्थिरता भी महत्वपूर्ण होती है।

नागेश्वरन ने कहा कि वित्तीय बाजार में बढ़ती भागीदारी को लंबी अवधि की बचत की दिशा में मोड़ना अगली बड़ी चुनौती है।

उनके अनुसार यदि भारतीय परिवार अधिक व्यवस्थित तरीके से रिटायरमेंट बचत शुरू करते हैं तो इसका लाभ केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को मिलेगा।

लंबी अवधि की बचत से देश में स्थायी पूंजी का निर्माण हो सकता है और इसे उत्पादक क्षेत्रों में निवेश किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट योजना को केवल बुजुर्गों का मुद्दा नहीं समझना चाहिए। यह कामकाजी उम्र के हर व्यक्ति के लिए वित्तीय अनुशासन का हिस्सा होना चाहिए।

कार्यक्रम में नागेश्वरन का मुख्य संदेश यही रहा कि भारतीय निवेशकों ने बाजार जोखिम स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन अब इस बदलाव को दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा से जोड़ने की जरूरत है।

इक्विटी और म्यूचुअल फंड में बढ़ती भागीदारी उत्साहजनक है, लेकिन भविष्य की जरूरतों के लिए पर्याप्त रिटायरमेंट फंड बनाना भी उतना ही जरूरी है।

उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में भारत की बदलती जनसांख्यिकी को देखते हुए परिवारों, वित्तीय संस्थानों और नीति निर्माताओं को मिलकर दीर्घकालिक बचत को बढ़ावा देना होगा।

इससे एक ओर लोगों को रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा मिलेगी, वहीं दूसरी ओर देश को विकास के लिए लंबे समय की पूंजी भी उपलब्ध हो सकेगी।

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