बेंगलुरु। कभी-कभी एक यात्रा के दौरान देखा गया छोटा सा विचार किसी कारोबार की पूरी दिशा बदल देता है। बेंगलुरु के उद्यमी गोपाल रामनारायण के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वर्ष 1965 में अमेरिका की यात्रा से लौटते समय वह अपने साथ एक ऐसा कारोबारी विचार लेकर आए, जिसने आगे चलकर उनके पारिवारिक व्यवसाय का भविष्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमेरिका में उन्होंने हल्के, टिकाऊ और आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाए जा सकने वाले एल्युमिनियम गार्डन फर्नीचर को देखा था। इसी अवधारणा को उन्होंने बेंगलुरु में अपनाने का फैसला किया।
उस दौर में भारत में घर और बगीचों के लिए इस्तेमाल होने वाले फर्नीचर में लकड़ी तथा अन्य पारंपरिक सामग्रियों का इस्तेमाल ज्यादा होता था। अमेरिका की यात्रा के दौरान गोपाल रामनारायण की नजर एल्युमिनियम से बने गार्डन फर्नीचर पर पड़ी। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका कम वजन था। साथ ही यह उपयोगी, टिकाऊ और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सुविधाजनक था।
रामनारायण ने इस उत्पाद में कारोबारी संभावना देखी। बेंगलुरु लौटने के बाद उन्होंने इस विचार को केवल एक अनुभव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे अपने पारिवारिक कारोबार में उतारने का फैसला किया। उन्होंने शहर के मैसूर रोड इलाके में स्थित एक यूनिट से एल्युमिनियम ट्यूब का इस्तेमाल कर घरेलू और गार्डन फर्नीचर बनाना शुरू किया।
उस समय इस तरह के फर्नीचर का निर्माण अपने आप में नया प्रयोग था। एल्युमिनियम की ट्यूब से तैयार फर्नीचर पारंपरिक भारी फर्नीचर की तुलना में हल्का था। इसे आसानी से उठाया और जरूरत के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर रखा जा सकता था। खास तौर पर खुले स्थानों, बगीचों और घर के उन हिस्सों के लिए यह उपयोगी विकल्प बन सकता था, जहां फर्नीचर को बार-बार स्थानांतरित करने की जरूरत पड़ती थी।
गोपाल रामनारायण के इस कदम ने उनके पारिवारिक कारोबार के लिए नई दिशा तैयार की। अमेरिका में देखे गए उत्पाद को भारतीय परिस्थितियों और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप तैयार करना उनके कारोबारी प्रयोग का अहम हिस्सा था। मैसूर रोड की यूनिट में शुरू हुआ उत्पादन धीरे-धीरे परिवार के व्यवसाय की पहचान बनने लगा।
वर्ष 1965 का भारत आज के मुकाबले औद्योगिक और उपभोक्ता बाजार के लिहाज से काफी अलग था। घरेलू उपयोग के उत्पादों में विकल्प सीमित थे और नए डिजाइन तथा सामग्रियों के प्रयोग का बाजार धीरे-धीरे विकसित हो रहा था। ऐसे समय में एल्युमिनियम ट्यूब से घर और गार्डन का फर्नीचर तैयार करने का विचार परंपरागत फर्नीचर उद्योग से अलग था।
एल्युमिनियम की विशेषताओं ने भी इस कारोबारी विचार को मजबूती दी। यह अपेक्षाकृत हल्की धातु है और इससे बनाए गए उत्पादों को संभालना आसान होता है। फर्नीचर के मामले में कम वजन एक महत्वपूर्ण फायदा था। कुर्सियों और अन्य वस्तुओं को घर से बगीचे या एक कमरे से दूसरे कमरे तक आसानी से ले जाया जा सकता था।
गोपाल रामनारायण की कहानी उस दौर के भारतीय उद्यमियों की सोच को भी दर्शाती है, जिन्होंने विदेशों में देखी गई नई तकनीकों और उत्पादों को भारतीय बाजार के अनुरूप ढालने की कोशिश की। केवल किसी विदेशी उत्पाद की नकल करने के बजाय स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और ग्राहकों की जरूरतों को समझते हुए उसका उत्पादन शुरू करना उद्यमिता का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
मैसूर रोड पर उत्पादन इकाई स्थापित करने का फैसला भी महत्वपूर्ण था। बेंगलुरु उस समय तेजी से औद्योगिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में उभर रहा था। शहर में विनिर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़े उद्योगों की मौजूदगी बढ़ रही थी। ऐसे माहौल में नए प्रकार के फर्नीचर का उत्पादन शुरू करना परिवार के कारोबार के विस्तार के लिए अवसर साबित हुआ।
शुरुआत में एल्युमिनियम ट्यूब का इस्तेमाल कर घर और बगीचे के लिए फर्नीचर बनाया गया। इसके पीछे उपयोगिता को प्राथमिकता दी गई। ऐसा फर्नीचर तैयार करने का प्रयास किया गया जो मजबूत होने के साथ ज्यादा भारी न हो और दैनिक उपयोग में आसानी से इस्तेमाल किया जा सके।
यह कारोबारी कहानी इस बात का भी उदाहरण है कि उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की जरूरतें समय के साथ कैसे बदलती हैं। एक दौर था जब फर्नीचर का अर्थ मुख्य रूप से भारी और लंबे समय तक एक ही स्थान पर रखी जाने वाली वस्तुओं से था। बाद में शहरी जीवनशैली बदलने के साथ हल्के, पोर्टेबल और व्यावहारिक फर्नीचर की मांग बढ़ती चली गई।
रामनारायण ने इस बदलाव की संभावना काफी पहले देख ली थी। अमेरिका में एल्युमिनियम गार्डन फर्नीचर देखने के बाद उन्होंने इसकी उपयोगिता को समझा और भारत लौटकर उस विचार को व्यावसायिक रूप दिया। यही फैसला आगे चलकर उनके पारिवारिक व्यवसाय की दिशा निर्धारित करने वाला साबित हुआ।
उद्यमिता में नए विचार की पहचान के साथ उसे वास्तविक उत्पाद में बदलना सबसे महत्वपूर्ण चुनौती होती है। गोपाल रामनारायण ने विदेश यात्रा के दौरान देखी गई अवधारणा को बेंगलुरु में उत्पादन इकाई के जरिए जमीन पर उतारा। एल्युमिनियम ट्यूब से फर्नीचर तैयार करने की शुरुआत ने परिवार के कारोबार को एक नई उत्पाद श्रेणी दी।
इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि नवाचार हमेशा किसी बिल्कुल नई तकनीक के आविष्कार से ही नहीं आता। कई बार किसी दूसरे बाजार में सफल उत्पाद को देखकर उसकी उपयोगिता पहचानना और उसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करना भी कारोबारी नवाचार बन जाता है।
1965 में अमेरिका से लौटे गोपाल रामनारायण का एल्युमिनियम फर्नीचर से जुड़ा विचार इसी सोच का उदाहरण बना। मैसूर रोड की एक यूनिट से एल्युमिनियम ट्यूब के जरिए घर और गार्डन फर्नीचर बनाने की शुरुआत ने धीरे-धीरे उनके पारिवारिक व्यवसाय को नई पहचान और दिशा दी। दशकों पुरानी यह कहानी बेंगलुरु की उद्यमशीलता और बदलते भारतीय उपभोक्ता बाजार की एक दिलचस्प झलक पेश करती है।