नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की हालिया मुलाकात के बाद अमेरिका की ओर से ईरान के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर सख्त चेतावनी सामने आई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि किसी भी देश को ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने या कमाई के नए रास्ते तैयार करने में मदद नहीं करनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा करने वाले देशों या संस्थाओं को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह नहीं कहा कि मोदी-पेजेश्कियान की मुलाकात से अमेरिका नाराज है। इसके उलट उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच किसी नए व्यापार समझौते पर बातचीत हो रही है। रुबियो ने स्वीकार किया कि अलग-अलग देश अपनी विदेश नीति के तहत ईरान से संपर्क और बातचीत कर सकते हैं। उनकी आपत्ति मुख्य रूप से ऐसी आर्थिक गतिविधियों को लेकर है जिनसे तेहरान को अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद मिले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात 31 अगस्त को किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO शिखर सम्मेलन से इतर हुई थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात पर चर्चा की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए भारत के इस रुख को दोहराया था कि समस्याओं का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए।
बैठक के दौरान समुद्री व्यापार और नौवहन की स्वतंत्रता का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। भारत ने कहा कि नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे के साथ व्यावसायिक जहाजों तथा नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता स्थापित करने के प्रयास जारी रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
भारत ने ईरान के साथ BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग जारी रखने की इच्छा भी जताई है। प्रधानमंत्री मोदी ने पेजेश्कियान को भारत में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित करने की बात भी दोहराई। इससे संकेत मिलता है कि नई दिल्ली पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद तेहरान के साथ अपने कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना चाहती है।
इसी बैठक के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि उन्हें भारत और ईरान के बीच किसी व्यापार समझौते की जानकारी नहीं है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका उन गतिविधियों को स्वीकार नहीं करेगा जिनके जरिए ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने या राजस्व जुटाने में मदद मिलती हो।
रुबियो के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उन देशों को दी गई चेतावनी है जो ईरान के साथ आर्थिक गतिविधियां जारी रखने या उसके लिए नए वित्तीय रास्ते तैयार करने पर विचार कर रहे हैं। अमेरिका पहले से ही ईरान पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए है और हाल के तनाव के बीच तेहरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ाया गया है।
अमेरिका का तर्क है कि ईरान को मिलने वाले अतिरिक्त राजस्व का इस्तेमाल ऐसी गतिविधियों में नहीं होना चाहिए जिन्हें वॉशिंगटन अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा मानता है। इसी कारण अमेरिकी प्रशासन दूसरे देशों और कंपनियों को भी ईरान से जुड़े लेन-देन को लेकर सावधान कर रहा है।
भारत के लिए ईरान केवल पश्चिम एशिया का एक महत्वपूर्ण देश नहीं है बल्कि रणनीतिक और कनेक्टिविटी के लिहाज से भी अहम है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध रहे हैं। क्षेत्रीय संपर्क और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच के संदर्भ में भी ईरान का महत्व रहा है।
ऐसे में अमेरिका की चेतावनी के बीच भारत के सामने अपने रणनीतिक हितों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है। भारत लंबे समय से अपनी विदेश नीति को रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर आगे बढ़ाता रहा है और अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध बनाए रखने पर जोर देता है।
मोदी और पेजेश्कियान की बैठक ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव गंभीर बना हुआ है। भारत के लिए क्षेत्र में शांति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक पश्चिम एशियाई देशों में रहते और काम करते हैं। इसके अलावा ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के महत्वपूर्ण मार्ग भी इसी क्षेत्र से गुजरते हैं।
खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी तरह की बाधा भारत समेत दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता का कारण बन सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पेजेश्कियान से बातचीत में नौवहन और व्यापार की स्वतंत्रता बनाए रखने पर जोर दिया।
रुबियो की चेतावनी से यह स्पष्ट है कि अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की अपनी रणनीति को लेकर सख्त है। वॉशिंगटन चाहता है कि दूसरे देश ऐसी व्यवस्था न बनाएं जिससे तेहरान अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम कर सके। हालांकि भारत को लेकर रुबियो ने किसी नए व्यापार समझौते की पुष्टि नहीं की है।
इसलिए मोदी-पेजेश्कियान बैठक को सीधे अमेरिका की नाराजगी से जोड़ने के बजाय इसे व्यापक अमेरिकी ईरान नीति के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा। फिलहाल अमेरिका की ओर से संदेश स्पष्ट है कि ईरान से कूटनीतिक संपर्क पर आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद करने वाली आर्थिक गतिविधियों पर कार्रवाई की जा सकती है।
आने वाले दिनों में भारत-ईरान संबंधों और अमेरिकी प्रतिबंध नीति के बीच यह संतुलन महत्वपूर्ण रहेगा। मोदी और पेजेश्कियान की बैठक ने जहां दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क जारी रहने का संकेत दिया है, वहीं मार्को रुबियो की चेतावनी ने साफ कर दिया है कि ईरान से जुड़े आर्थिक लेन-देन पर अमेरिका की कड़ी नजर बनी हुई है।