कम सैलरी के विरोध में हिंसक प्रदर्शन, बांग्लादेश में फैक्ट्रियां बंद, सरकार की बढ़ी चिंता
ढाका: बांग्लादेश में गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले हजारों मजदूरों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है। कम वेतन और बढ़ती महंगाई से परेशान कपड़ा उद्योग के कर्मचारियों ने न्यूनतम मासिक वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू कर दिया है। राजधानी ढाका समेत कई औद्योगिक इलाकों में मजदूरों ने सड़कें जाम कर दीं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कर्मचारियों के बीच झड़पें हुईं। कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी सामने आई हैं। पुलिस की गाड़ियों, सुरक्षा चौकियों और फैक्ट्री परिसरों को निशाना बनाए जाने की खबर है। हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा।
इस आंदोलन का असर बांग्लादेश के सबसे बड़े निर्यात उद्योगों में शामिल रेडीमेड गारमेंट (RMG) सेक्टर पर पड़ा है। बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (BGMEA) के मुताबिक, 1 नवंबर को देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में 529 फैक्ट्रियों का कामकाज प्रभावित हुआ और करीब 9.87 लाख कर्मचारी काम छोड़कर बाहर निकल गए। हालांकि, 2 नवंबर को कई फैक्ट्रियों में काम दोबारा शुरू हुआ है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्रों में तनाव बना हुआ है।
12,500 टका वेतन बढ़ाकर 30 हजार करने की मांग
गारमेंट फैक्ट्री के कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांग न्यूनतम मासिक वेतन बढ़ाने की है। वर्तमान में बांग्लादेश के गारमेंट सेक्टर में न्यूनतम मासिक वेतन 12,500 टका निर्धारित है। मजदूर इसे बढ़ाकर 30,000 टका यानी लगभग 240 से 245 अमेरिकी डॉलर करने की मांग कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का कहना है कि मौजूदा वेतन में परिवार चलाना बेहद मुश्किल हो गया है। पिछले कुछ समय में खाने-पीने की वस्तुओं, मकान के किराए, परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाओं का खर्च काफी बढ़ गया है। ऐसे में पुराने वेतन पर गुजारा करना मुश्किल हो रहा है।
मजदूरों का कहना है कि कपड़ा उद्योग से देश को भारी विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, लेकिन इस उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों को उनकी मेहनत के हिसाब से वेतन नहीं मिल रहा है। इसी कारण अब वेतन में बड़ी बढ़ोतरी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
ढाका से गाजीपुर तक फैल गया आंदोलन
वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन अब कई औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंच गया है। राजधानी ढाका के मीरपुर के अलावा सावर, आशुलिया और गाजीपुर में भी मजदूर सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने कई प्रमुख सड़कों और हाईवे पर जाम लगा दिया, जिससे यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई।
गाजीपुर के कालीकैर और कोनाबाड़ी इलाकों में भी प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटनाएं सामने आईं। मजदूरों और पुलिस के बीच टकराव के बाद कई स्थानों पर आगजनी हुई। फैक्ट्री के एक गोदाम, पुलिस चौकी और वाहनों को आग के हवाले किए जाने की खबर है।
ढाका के मीरपुर इलाके में भी प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की एक गाड़ी में आग लगा दी। इसके अलावा सावर में एक गारमेंट फैक्ट्री की सुरक्षा चौकी को भी आग के हवाले कर दिया गया। इन घटनाओं के बाद औद्योगिक क्षेत्रों में पुलिस और सीमा सुरक्षा बल के जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई।
पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का किया इस्तेमाल
प्रदर्शन के दौरान कई जगह हालात तनावपूर्ण हो गए। मजदूरों ने सड़कें जाम कर अपना विरोध दर्ज कराया, जिसके चलते पुलिस के साथ टकराव की स्थिति बनी। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों की ओर से ईंट-पत्थर फेंके जाने की खबर भी आई।
स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। इसके बावजूद कई औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदर्शन जारी रहा।
सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के जवानों को भी तैनात किया है। गाजीपुर में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां भेजी गईं। प्रशासन के सामने एक तरफ प्रदर्शनकारियों को शांत कराने और दूसरी तरफ फैक्ट्रियों में उत्पादन शुरू कराने की चुनौती है।
सरकार ने बनाया छह सदस्यीय वेतन बोर्ड
लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शन को देखते हुए बांग्लादेश सरकार ने रविवार को छह सदस्यीय न्यूनतम वेतन बोर्ड का गठन किया। इस बोर्ड में मजदूरों, फैक्ट्री मालिकों, सरकार और स्वतंत्र प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है।
इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य गारमेंट सेक्टर में मौजूदा वेतन व्यवस्था की समीक्षा करना और कर्मचारियों की वेतन वृद्धि की मांग पर विचार करना है।
प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी स्थिति को लेकर मंत्रियों और सलाहकारों के साथ आपात बैठक की। सरकार की ओर से मजदूर संगठनों और उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने की कोशिश की जा रही है।
सोमवार को गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने भी सचिवालय में गारमेंट फैक्ट्री मालिकों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। इसका उद्देश्य औद्योगिक क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करना और मजदूरों की मांगों के समाधान की दिशा में बातचीत करना था।
529 फैक्ट्रियों में कामकाज प्रभावित, करीब 10 लाख मजदूरों पर असर
इस आंदोलन का सबसे बड़ा असर बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग पर पड़ा है। BGMEA की रिपोर्ट के अनुसार, 1 नवंबर को ढाका, गाजीपुर, मयमनसिंह, सावर और आशुलिया के औद्योगिक क्षेत्रों में कुल 529 फैक्ट्रियों में कामकाज प्रभावित हुआ।
इनमें गाजीपुर और मयमनसिंह की 276 फैक्ट्रियां शामिल थीं। सावर, आशुलिया और जिरानी क्षेत्र की 185 फैक्ट्रियों में भी उत्पादन प्रभावित हुआ। वहीं, ढाका महानगर के मीरपुर इलाके की 68 फैक्ट्रियां आंदोलन की चपेट में आईं।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 9,87,190 कर्मचारी अपने कार्यस्थलों से बाहर निकल गए थे। कई फैक्ट्री प्रबंधन ने सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अस्थायी छुट्टी घोषित कर दी थी।
हालांकि, सोमवार को कई कारखाने दोबारा खुल गए और उत्पादन शुरू होने की जानकारी सामने आई। इसके बावजूद प्रबंधन को आशंका है कि आंदोलन फिर तेज हुआ तो कामकाज दोबारा प्रभावित हो सकता है।
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर
बांग्लादेश का गारमेंट उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस सेक्टर में करीब 40 लाख लोग काम करते हैं। देश की कुल निर्यात कमाई में रेडीमेड गारमेंट उद्योग की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक बताई जाती है। देश की जीडीपी में भी इसका करीब 10 प्रतिशत योगदान है।
ऐसे में यदि आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता है, तो कपड़ों के उत्पादन, निर्यात और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के ऑर्डर पर असर पड़ सकता है। फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि उत्पादन लागत, ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा के बीच वेतन को दोगुने से अधिक बढ़ाना आसान नहीं है।
वहीं मजदूर संगठनों का तर्क है कि महंगाई के अनुपात में वेतन बढ़ना जरूरी है। उनका कहना है कि कम वेतन पर कर्मचारियों से लगातार काम कराने से उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो रही है।
क्या जल्द शांत होंगे हालात?
फिलहाल बांग्लादेश सरकार ने वेतन बोर्ड का गठन कर मजदूरों की मांगों पर विचार शुरू कर दिया है। गृह मंत्रालय और फैक्ट्री मालिकों के बीच बातचीत भी जारी है। लेकिन मजदूरों की 30 हजार टका न्यूनतम वेतन की मांग और फैक्ट्री मालिकों की आर्थिक चिंताओं के बीच सहमति बनना अभी बाकी है।
सरकार ने कर्मचारियों से काम पर लौटने और अपनी मांगें बातचीत के माध्यम से रखने की अपील की है। दूसरी ओर मजदूर संगठनों का कहना है कि जब तक वेतन संबंधी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन समाप्त करने का सवाल नहीं उठता।
कुल मिलाकर बांग्लादेश में गारमेंट मजदूरों का यह आंदोलन अब केवल वेतन वृद्धि तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर देश की औद्योगिक गतिविधियों, निर्यात कारोबार और आर्थिक व्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। आने वाले दिनों में सरकार और मजदूर संगठनों के बीच होने वाली बातचीत से ही स्पष्ट होगा कि इस आंदोलन का समाधान किस दिशा में निकलता है।