बगदाद। अमेरिका ने बुधवार, 30 सितंबर 2026 को इराक में अपने सैन्य मिशन का औपचारिक रूप से अंत कर दिया। अमेरिकी सेना ने इराक से अंतिम सैनिकों की वापसी पूरी होने की घोषणा की है। इसके साथ ही इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ 2014 में शुरू हुआ करीब 12 साल पुराना अमेरिकी सैन्य अभियान समाप्त हो गया। अंतिम अमेरिकी सैनिकों ने उत्तरी इराक के अर्ध-स्वायत्त कुर्दिस्तान क्षेत्र में स्थित एरबिल के सैन्य ठिकाने को छोड़ा।
अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने सैनिकों और सैन्य उपकरणों की वापसी को व्यवस्थित प्रक्रिया बताया है। अमेरिकी सैन्य मिशन खत्म होने के बाद अब इराक की सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी वहां के सुरक्षा बलों के पास होगी। हालांकि अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि सैनिकों की वापसी के बावजूद इराक के साथ सुरक्षा संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे। अमेरिका भविष्य में लक्षित प्रशिक्षण और खुफिया सहयोग के जरिए इराकी सुरक्षा बलों की मदद जारी रखेगा।
अमेरिकी सैनिकों की वापसी का समझौता वर्ष 2024 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन और इराक सरकार के बीच हुआ था। उस समझौते में दो चरणों वाली व्यवस्था बनाई गई थी। पहले चरण के तहत इराक में अमेरिका के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के सैन्य मिशन को सितंबर 2025 तक समाप्त करना था। दूसरे चरण में पूर्वोत्तर सीरिया में ISIS के खिलाफ चल रहे अभियान को इराक स्थित प्लेटफॉर्म से सितंबर 2026 तक समर्थन देने की व्यवस्था रखी गई थी। अब इस दूसरे चरण की समयसीमा भी पूरी हो गई है।
बाइडेन प्रशासन के दौरान बनी इस योजना को बाद में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी लागू करना जारी रखा। पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी सेना ने इराक के ज्यादातर हिस्सों में मौजूद अपने सैन्य ठिकानों से सैनिकों की संख्या कम कर दी थी। अंतिम चरण में मुख्य अमेरिकी मौजूदगी एरबिल और आसपास के उत्तरी क्षेत्र तक सीमित रह गई थी। बुधवार को यहां से भी अंतिम सैनिकों के निकलने के साथ सैन्य मिशन का अंत हो गया।
इराक में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का इतिहास दो दशकों से भी ज्यादा पुराना है। वर्ष 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर सैन्य हमला किया गया था, जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार गिर गई। इसके बाद बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक कई वर्षों तक इराक में तैनात रहे। अमेरिका ने 2011 के अंत में अपने ज्यादातर सैनिकों को इराक से वापस बुला लिया था।
लेकिन लगभग तीन साल बाद हालात बदल गए। 2014 में ISIS ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर मोसुल भी उसके नियंत्रण में चला गया और संगठन की बढ़ती ताकत के कारण इराकी सरकार पर बड़ा दबाव पैदा हो गया। इसके बाद इराकी अधिकारियों के अनुरोध पर अमेरिका के नेतृत्व वाली सेना दोबारा वापस आई और ISIS के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया गया।
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने हवाई हमलों, खुफिया सूचनाओं, प्रशिक्षण और इराकी सुरक्षा बलों की सहायता के जरिए ISIS के खिलाफ अभियान चलाया। संगठन का स्वयं घोषित क्षेत्रीय 'खिलाफत' बाद के वर्षों में खत्म हो गया। हालांकि ISIS पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ और उसके छोटे समूह तथा स्लीपर सेल विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय बने रहे। इसी वजह से अमेरिकी सेना इराकी सुरक्षा बलों को खुफिया जानकारी, हवाई निगरानी और प्रशिक्षण उपलब्ध कराती रही।
अमेरिकी सेना ने अब कहा है कि 12 साल के अभियान ने ISIS को इराक और क्षेत्र में एक संगठित सैन्य खतरे के रूप में पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सैनिकों की वापसी के साथ अब यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से इराकी सुरक्षा बलों पर होगी कि वे ISIS के बचे हुए नेटवर्क को दोबारा मजबूत होने से रोकें। इराक सरकार ने भी कहा है कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का मिशन समाप्त होने का अर्थ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई समाप्त होना नहीं है।
सैनिकों की वापसी को इराक सरकार देश की संप्रभुता की दिशा में नए चरण के रूप में देख रही है। इराकी नेतृत्व का कहना है कि देश की सुरक्षा संस्थाएं अब अपनी जिम्मेदारी संभालने के लिए पहले से अधिक सक्षम हैं। वहीं कुछ सुरक्षा अधिकारियों और विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि अमेरिकी सैनिकों और उनकी हवाई तथा खुफिया क्षमताओं के हटने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
खासकर उत्तरी कुर्दिस्तान क्षेत्र में अमेरिकी वापसी को लेकर चिंता सामने आई है। वहां के अधिकारियों का ध्यान अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम हटाए जाने और क्षेत्रीय तनाव के बीच सुरक्षा चुनौतियों पर है। इसके अलावा इराक में ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों की भूमिका और ISIS के बचे हुए नेटवर्क को लेकर भी सवाल बने हुए हैं।
अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद भी वॉशिंगटन और बगदाद के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग जारी रहने की संभावना है। पेंटागन के मुताबिक अमेरिका इराकी साझेदारों को जरूरत के अनुसार प्रशिक्षण और खुफिया सहयोग देता रहेगा। यानी यह सैन्य गठबंधन के युद्धकालीन मिशन से सामान्य द्विपक्षीय सुरक्षा संबंध की ओर बदलाव है।
इस तरह 30 सितंबर 2026 इराक में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तारीख बन गई है। 2003 के हमले, 2011 की पहली वापसी और 2014 में ISIS के खिलाफ दोबारा सैनिक भेजे जाने के बाद अब अमेरिका ने अपने अंतिम सैन्य ठिकानों से भी सैनिक वापस बुला लिए हैं। इसके साथ 12 साल पुराना ISIS विरोधी सैन्य मिशन खत्म हो गया है, लेकिन इराक के सामने आतंकवाद, सशस्त्र समूहों और क्षेत्रीय तनाव से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।