वॉशिंगटन: अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा उठाए गए एक बड़े कदम ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। अमेरिकी न्याय विभाग ने मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को देश के सभी 50 राज्यों में लगभग 1000 चुनाव मॉनिटर और पर्यवेक्षकों की तैनाती की। विभाग ने इसे अपने इतिहास का सबसे बड़ा चुनाव निगरानी अभियान बताया है। हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं और मतदान अधिकार संगठनों ने इस कदम पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि संघीय अधिकारियों की इतनी बड़ी संख्या में मौजूदगी मतदाताओं के बीच डर का माहौल पैदा कर सकती है। दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य चुनावी पारदर्शिता बनाए रखना और मतदान प्रक्रिया में लोगों का विश्वास मजबूत करना है। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, चुनाव मॉनिटर और पर्यवेक्षकों को सभी 50 राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में भेजा गया। इनका मुख्य कार्य मतदान केंद्रों पर संघीय चुनाव कानूनों के पालन की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक के मतदान अधिकारों का उल्लंघन न हो। विभाग का दावा है कि यह अभियान किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाया गया है।
हालांकि, समाचार एजेंसी रॉयटर्स के विश्लेषण में सामने आया है कि जिन क्षेत्रों में चुनाव मॉनिटर तैनात किए गए, उनमें से लगभग दो-तिहाई क्षेत्रों में 2024 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कमला हैरिस को डोनाल्ड ट्रंप से अधिक समर्थन मिला था। इन क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान भी शामिल हैं, जहां अश्वेत और लातीनी समुदाय के मतदाताओं की संख्या अधिक है। इसी तथ्य को आधार बनाकर डेमोक्रेटिक नेताओं ने तैनाती के उद्देश्य पर सवाल उठाए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन चुनावी निगरानी के नाम पर उन इलाकों में संघीय अधिकारियों की मौजूदगी बढ़ा रहा है, जहां विपक्षी पार्टी का जनाधार मजबूत है। पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि इससे मतदाताओं के मन में अनावश्यक आशंका पैदा हो सकती है और मतदान प्रक्रिया प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है। चुनाव मॉनिटर की तैनाती अपने आप में कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है। अमेरिकी न्याय विभाग पहले भी राष्ट्रपति और संसदीय चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों पर पर्यवेक्षक भेजता रहा है। इनकी जिम्मेदारी मतदान अधिकारों की रक्षा करना और चुनाव संबंधी संघीय कानूनों का पालन सुनिश्चित कराना होती है। इस बार विवाद का प्रमुख कारण तैनात किए गए अधिकारियों की रिकॉर्ड संख्या और उनके लिए चुने गए क्षेत्रों का राजनीतिक स्वरूप है।
न्याय विभाग के नागरिक अधिकार प्रभाग की प्रमुख हरमीत के. ढिल्लों ने प्रशासन के फैसले का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि विभाग चुनावी पारदर्शिता सुनिश्चित करने और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए काम कर रहा है। उनके अनुसार, निगरानी की प्रक्रिया निष्पक्ष और बिना किसी भेदभाव के संचालित की जा रही है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव मॉनिटर का काम संघीय मतदान अधिकार कानूनों के पालन का निरीक्षण करना है। इन अधिकारियों को मतदान केंद्रों पर अपनी मर्जी से जांच करने, मतदाताओं को रोकने या मतदान प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। स्थानीय और राज्य चुनाव कानूनों के तहत कुछ मतदान केंद्रों के भीतर उनकी मौजूदगी पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
इस विवाद के बीच अदालत की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। मतदान अधिकार संगठनों ने संघीय चुनाव मॉनिटर की तैनाती को लेकर कानूनी आपत्तियां उठाई थीं। 2 नवंबर को एक संघीय अदालत ने सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि संबंधित मॉनिटर हथियार लेकर न जाएं, वर्दी में न हों और उनके पास गिरफ्तारी करने का अधिकार न हो। अदालत के निर्देशों का उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को किसी भी तरह के दबाव से मुक्त रखना था।
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