न्यूयॉर्क। विदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध) सुधाकर दलेला ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र के दौरान सबसे कम विकसित देशों यानी LDCs की वार्षिक मंत्री स्तरीय बैठक में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने LDCs के साथ भारत की मजबूत विकास साझेदारी दोहराते हुए उनके टिकाऊ और स्थायी विकास के लिए आसान वित्तपोषण, स्थानीय उत्पादन, रोजगार सृजन और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने का आह्वान किया।विदेश मंत्रालय के मुताबिक दलेला ने कहा कि भारत की LDCs के साथ साझेदारी मांग आधारित विकास सहयोग के सिद्धांत पर टिकी है। इसके तहत भारत ITEC कार्यक्रम, रियायती ऋण, अनुदान सहायता और भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष जैसे माध्यमों से सहयोग करता रहा है। भारत ने इस मंच पर विकासशील और सबसे कम विकसित देशों की प्राथमिकताओं के अनुरूप सहयोग जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

बैठक में दलेला ने कहा कि LDCs को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और इस श्रेणी से टिकाऊ तरीके से आगे बढ़ने में मदद करने के लिए केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ऐसी वित्तीय व्यवस्था की आवश्यकता है जो इन देशों के लिए आसानी से उपलब्ध हो और उन पर अस्थिर ऋण का अतिरिक्त दबाव न डाले। उन्होंने स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर तैयार करने वाले क्षेत्रों में निवेश पर भी जोर दिया।LDC यानी Least Developed Countries संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहचाने गए ऐसे देश हैं जिन्हें आय, मानव संसाधन और आर्थिक तथा पर्यावरणीय संवेदनशीलता जैसे मानकों पर गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन देशों के विकास के लिए विशेष सहयोग, व्यापार सुविधाओं और वित्तीय सहायता पर जोर देता रहा है। ऐसे देशों का LDC श्रेणी से बाहर निकलना ‘ग्रेजुएशन’ कहलाता है।

भारत लंबे समय से दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तहत LDCs और अन्य विकासशील देशों के साथ काम करता रहा है। विदेश मंत्रालय के पुराने वार्षिक दस्तावेजों में भी LDCs, लैंडलॉक्ड विकासशील देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के साथ भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष तथा अन्य माध्यमों से सहयोग को भारत की प्राथमिकताओं में शामिल बताया गया है।दलेला ने तकनीकी साझेदारी को भी विकास की महत्वपूर्ण जरूरत बताया। भारत विभिन्न विकासशील देशों के अधिकारियों और पेशेवरों को ITEC यानी Indian Technical and Economic Cooperation कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण का अवसर देता रहा है। इसके अलावा रियायती ऋण और अनुदान सहायता के जरिए बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं में भी सहयोग किया जाता है।

LDCs की बैठक के अलावा सुधाकर दलेला ने संयुक्त राष्ट्र में ‘Delivering the Sendai Framework: An ASEAN Approach to Inclusive Disaster and Climate Resilience’ विषय पर आयोजित विशेष कार्यक्रम को भी संबोधित किया। इसका आयोजन थाईलैंड, फिलीपींस, जापान और संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय यानी UNDRR ने संयुक्त रूप से किया था।इस कार्यक्रम में दलेला ने आपदा प्रबंधन और जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए भारत की तैयारियों का उल्लेख किया। उन्होंने भारत में मजबूत किए गए अर्ली वार्निंग सिस्टम, जोखिम को ध्यान में रखकर तैयार किए जा रहे बुनियादी ढांचे और आपदा तैयारियों की चर्चा की। उन्होंने Coalition for Disaster Resilient Infrastructure यानी CDRI और भारत-ASEAN के बीच आपदा तैयारी तथा प्रतिक्रिया के क्षेत्र में सहयोग को भी रेखांकित किया।

भारत की पहल CDRI का उद्देश्य विभिन्न देशों को ऐसे बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग देना है जो प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु से जुड़े खतरों का बेहतर तरीके से सामना कर सके। आपदा जोखिम न्यूनीकरण के क्षेत्र में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अर्ली वार्निंग, अर्ली एक्शन, क्षमता निर्माण और ज्ञान साझा करने को प्राथमिकता देने की बात पहले भी कही है।दलेला ने इस बात पर जोर दिया कि केवल किसी संभावित आपदा की पहले से चेतावनी देना पर्याप्त नहीं है। अर्ली वार्निंग को समय पर कार्रवाई में बदलना भी जरूरी है, ताकि जोखिम वाले समुदायों और लोगों की जान तथा आजीविका की रक्षा की जा सके। उन्होंने आपदा से निपटने की योजनाओं को अधिक समावेशी बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया।

इस दौरान भारत ने वर्ष 2030 में चौथे संयुक्त राष्ट्र विश्व आपदा जोखिम न्यूनीकरण सम्मेलन की मेजबानी करने की अपनी पेशकश भी दोहराई। यह प्रस्ताव आपदा जोखिम कम करने और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने की भारत की कोशिशों का हिस्सा है।कार्यक्रम में थाईलैंड के उप प्रधानमंत्री सिहासक फुआंगकेटकेव, ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग, फिलीपींस की विदेश सचिव मारिया थेरेसा पी. लजारो और अन्य प्रतिनिधि भी मौजूद थे। चर्चा का फोकस Sendai Framework को लागू करने और ASEAN क्षेत्र में समावेशी आपदा तथा जलवायु लचीलापन मजबूत करने पर रहा।इससे पहले दलेला ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के उच्च स्तरीय जलवायु कार्यक्रम के दौरान अनुकूलन वित्त से जुड़े ‘Solutions Dialogue on Financing Adaptation’ में भी हिस्सा लिया था। उन्होंने भारत की जीवनरक्षक प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर की योजनाओं में जलवायु अनुकूलन को शामिल करने के प्रयासों का उल्लेख किया।

दलेला ने जलवायु अनुकूलन के लिए पूर्वानुमान योग्य वित्त उपलब्ध कराने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि विकासशील और संवेदनशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए मिलने वाली वित्तीय सहायता ऐसी होनी चाहिए जिससे उनके ऋण बोझ में और बढ़ोतरी न हो।UNGA के 81वें सत्र से इतर हुई इन बैठकों में भारत का फोकस विकासशील देशों के लिए वित्त, तकनीक और क्षमता निर्माण के साथ आपदा तथा जलवायु लचीलेपन पर रहा। LDCs की बैठक में जहां सुधाकर दलेला ने स्थानीय उत्पादन, रोजगार और तकनीकी साझेदारी को टिकाऊ विकास का आधार बताया, वहीं Sendai Framework से जुड़े कार्यक्रम में उन्होंने समय पर चेतावनी को प्रभावी कार्रवाई में बदलने और आपदा से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने पर जोर दिया।

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