रियाद/वॉशिंगटन। मध्य पूर्व में तेजी से बिगड़ते हालात के बीच सऊदी अरब और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे हुई बातचीत को लेकर बड़ा दावा सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस **मोहम्मद बिन सलमान (MBS)** ने अमेरिकी राष्ट्रपति **डोनाल्ड ट्रंप** को एक ही दिन में दो बार फोन किया और यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का आग्रह किया। लेकिन ट्रंप ने सऊदी अरब की इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अमेरिकी प्रशासन फिलहाल हूतियों के खिलाफ सीधे नया सैन्य मोर्चा खोलने से बचना चाहता है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हूती लड़ाकों की गतिविधियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ा दिया है। सऊदी अरब पर हाल में हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद रियाद की चिंता भी बढ़ी है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने सऊदी नेतृत्व अमेरिका से ईरान के खिलाफ तनाव कम करने और कूटनीति को प्राथमिकता देने की अपील कर रहा था। अब हूतियों के बढ़ते दबाव के बीच परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं।
दो बार ट्रंप को फोन करने का दावा
Axios की रिपोर्ट के मुताबिक मोहम्मद बिन सलमान ने गुरुवार को ट्रंप को दो बार फोन किया।
इन बातचीत में उन्होंने कथित तौर पर अमेरिका से हूतियों के खिलाफ सैन्य हमला करने का आग्रह किया।
मामले की जानकारी रखने वाले अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया कि सऊदी नेतृत्व हूतियों की बढ़ती सैन्य क्षमता और रणनीतिक इलाकों की तरफ उनकी बढ़त को गंभीर खतरे के रूप में देख रहा है।
हालांकि रिपोर्ट में ऐसा कोई प्रमाणित शब्दशः ट्रांसक्रिप्ट नहीं दिया गया है जिससे यह कहा जा सके कि क्राउन प्रिंस ने ठीक 'प्लीज मदद कीजिए' जैसे शब्द इस्तेमाल किए थे। इसलिए इस तरह की भाषा को उनकी बेचैनी का वर्णन माना जाना चाहिए, प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं।
ट्रंप ने क्यों कर दिया इनकार?
रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य हमले की मांग स्वीकार नहीं की।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि प्रशासन इस समय हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई शुरू करने की योजना नहीं बना रहा है।
अमेरिका पहले से मध्य पूर्व में बड़े तनाव का सामना कर रहा है। ईरान के साथ संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा अमेरिकी रणनीति के प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।
ऐसे समय यमन में एक और सीधा सैन्य मोर्चा खोलना अमेरिका के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।
इसीलिए वॉशिंगटन फिलहाल सऊदी अरब को समर्थन देने और खुफिया तथा रणनीतिक सहयोग बढ़ाने के रास्ते पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है।
हूतियों ने बढ़ाई सऊदी अरब की चिंता
सऊदी अरब की बेचैनी के पीछे हूती विद्रोहियों की हालिया सैन्य गतिविधियां हैं।
हूतियों ने सऊदी अरब के कई इलाकों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाया है। हाल के बड़े हमलों में दक्षिणी सऊदी अरब के शहर और ऊर्जा प्रतिष्ठान प्रभावित हुए तथा 70 से ज्यादा लोग घायल हुए।
इसके बाद हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी।
सबसे बड़ी चिंता बाब अल-मंदेब को लेकर है।
यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।
बाब अल-मंदेब पर क्यों टिकी दुनिया की नजर?
बाब अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है।
एशिया और यूरोप के बीच आने-जाने वाले जहाजों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण रास्ता है।
अगर इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो वैश्विक सप्लाई चेन और तेल बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।
ताजा रिपोर्टों के अनुसार हूती बलों ने पेरिम द्वीप और धुबाब जैसे रणनीतिक इलाकों पर नियंत्रण मजबूत किया है। इससे बाब अल-मंदेब के आसपास उनकी स्थिति और मजबूत हुई है।
यही घटनाक्रम सऊदी अरब के साथ अमेरिका और दूसरे देशों के लिए चिंता बढ़ा रहा है।
तेल की कीमतों पर भी असर
मध्य पूर्व का यह संकट केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं है।
इसका सीधा संबंध दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति से है।
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल है। अगर उसके तेल प्रतिष्ठानों या निर्यात मार्गों पर लगातार हमले होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
हूतियों के हमलों और लाल सागर के रास्ते पर बढ़ते खतरे के कारण पहले ही तेल बाजार में चिंता बढ़ी है।
साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर जारी तनाव ने स्थिति और जटिल कर दी है।
अगर होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों समुद्री मार्ग एक साथ गंभीर संकट में आते हैं तो वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।
अमेरिका नहीं चाहता नया युद्ध?
ट्रंप प्रशासन के फैसले के पीछे यही रणनीतिक गणित महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अमेरिका सऊदी अरब को क्षेत्रीय साझेदार मानता है, लेकिन हूतियों पर सीधा हमला एक नए युद्ध की शुरुआत कर सकता है।
हूती ईरान के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में अमेरिका का बड़ा हमला ईरान और उसके सहयोगी समूहों की जवाबी कार्रवाई को बढ़ा सकता है।
इससे इराक, यमन, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष का दायरा बढ़ने का खतरा होगा।
इसीलिए अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के बजाय सहयोगी की भूमिका तक सीमित रहने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।
अमेरिकी सैन्य अधिकारी पहुंचे सऊदी अरब
हालांकि ट्रंप ने कथित तौर पर हमले से इनकार किया है, इसका अर्थ यह नहीं कि अमेरिका सऊदी अरब को अकेला छोड़ रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर सऊदी अरब पहुंचे हैं।
उनकी यात्रा का उद्देश्य सऊदी अधिकारियों के साथ सैन्य और सुरक्षा सहयोग पर बातचीत करना बताया गया है।
अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी और रणनीतिक सहयोग उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
लेकिन फिलहाल अमेरिकी सेना की ओर से हूतियों के खिलाफ प्रत्यक्ष हमला करने की योजना नहीं बताई गई है।
कुछ दिन पहले हुआ था बड़ा हमला
सऊदी अरब की चिंता समझने के लिए हाल के हूती हमलों को देखना जरूरी है।
8 सितंबर को हूतियों ने दक्षिणी सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की बड़ी लहर शुरू की थी।
इनमें अबहा, जजान, नजरान और खमीस मुशैत जैसे इलाके निशाने पर आए।
हमलों में तेल और दूसरे आर्थिक प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया और 73 लोगों के घायल होने की रिपोर्ट सामने आई।
इसके बाद सऊदी नेतृत्व पर जवाबी कार्रवाई का दबाव बढ़ना स्वाभाविक था।
हूती आखिर हैं कौन?
हूती आंदोलन यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक समूह है, जिसे अंसार अल्लाह के नाम से भी जाना जाता है।
समूह ने पिछले दशक में यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित किया है और राजधानी सना भी उसके नियंत्रण में है।
सऊदी अरब और हूतियों के बीच लंबे समय से संघर्ष चलता रहा है।
रियाद हूतियों को क्षेत्र में ईरान के प्रभाव के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखता है।
ईरान हूतियों पर अपने सैन्य नियंत्रण से इनकार करता रहा है, लेकिन पश्चिमी और क्षेत्रीय देश उस पर हथियार तथा अन्य सहायता देने के आरोप लगाते रहे हैं।
सऊदी नीति में बड़ा बदलाव?
इस घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू सऊदी अरब की हालिया रणनीति है।
पिछले कुछ समय में मोहम्मद बिन सलमान का फोकस क्षेत्रीय तनाव कम करने पर रहा था।
2 अगस्त को सऊदी अरब की आधिकारिक समाचार एजेंसी ने बताया था कि क्राउन प्रिंस ने ट्रंप के साथ बातचीत में संवाद को प्राथमिकता देने और व्यापक संघर्ष से बचने की जरूरत पर जोर दिया था।
अब लगभग एक महीने बाद हूतियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग किए जाने की रिपोर्ट बताती है कि जमीन पर बदलते हालात ने रियाद की प्राथमिकताओं पर दबाव बढ़ाया है।
सऊदी अरब के लिए आर्थिक खतरा भी
मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने के लिए Vision 2030 जैसी बड़ी योजनाओं पर काम कर रहे हैं।
देश में पर्यटन, टेक्नोलॉजी, मनोरंजन और विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर अरबों डॉलर का निवेश हो रहा है।
लेकिन लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले विदेशी निवेशकों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा सकते हैं।
अगर तेल प्रतिष्ठानों को बार-बार निशाना बनाया जाता है तो सऊदी अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण आय स्रोत पर भी खतरा पैदा होता है।
इसलिए हूतियों की बढ़ती सैन्य गतिविधि रियाद के लिए केवल सुरक्षा नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती भी है।
ईरान फैक्टर सबसे महत्वपूर्ण
हूती संकट को ईरान से अलग करके देखना मुश्किल है।
मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव पहले ही बेहद गंभीर है।
अगर अमेरिका हूतियों के खिलाफ बड़े हमले करता है तो तेहरान इसे अपने सहयोगी समूह पर हमला मान सकता है।
इससे अमेरिकी ठिकानों, जहाजों या खाड़ी देशों पर जवाबी कार्रवाई का जोखिम बढ़ सकता है।
इसी वजह से ट्रंप प्रशासन के सामने कठिन विकल्प है।
सऊदी अरब की मदद करनी है, लेकिन ऐसी मदद नहीं करनी जिससे अमेरिका एक और व्यापक युद्ध में फंस जाए।
पहले ईरान पर हमले रोकने को कह रहा था सऊदी अरब
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा विरोधाभास भी दिखाई देता है।
अगस्त की शुरुआत में सऊदी क्राउन प्रिंस ने ट्रंप से ईरान के खिलाफ बड़े हमलों को लेकर चिंता जताई थी और तनाव कम करने पर जोर दिया था। ([Axios][5])
अब हूतियों की बढ़ती ताकत के बीच उन्हीं MBS द्वारा अमेरिकी हमले की मांग किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
यह दिखाता है कि मध्य पूर्व की रणनीतिक तस्वीर कितनी तेजी से बदल रही है।
आज जिस सैन्य कार्रवाई को कोई देश रोकना चाहता है, बदलती सुरक्षा परिस्थितियों में वही देश कुछ सप्ताह बाद अमेरिकी सैन्य सहायता मांग सकता है।
क्या अमेरिका बाद में फैसला बदल सकता है?
फिलहाल ट्रंप ने हूतियों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई से इनकार किया है।
लेकिन मध्य पूर्व में हालात बहुत तेजी से बदल रहे हैं।
अगर हूती किसी बड़े तेल प्रतिष्ठान को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं, अमेरिकी हितों को निशाना बनाते हैं या बाब अल-मंदेब में जहाजों की आवाजाही बड़े स्तर पर बाधित होती है तो अमेरिका अपनी रणनीति पर दोबारा विचार कर सकता है।
अमेरिकी प्रशासन के लिए लाल सागर में नौवहन की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।
इसलिए वर्तमान इनकार को हमेशा के लिए सैन्य कार्रवाई से इनकार नहीं माना जा सकता।
दो फोन कॉल ने खोली पर्दे के पीछे की कहानी
मोहम्मद बिन सलमान की कथित दो फोन कॉल ने मध्य पूर्व में चल रही पर्दे के पीछे की कूटनीति की एक झलक जरूर दिखाई है।
एक तरफ सऊदी अरब हूती हमलों और तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर दबाव में है।
दूसरी तरफ अमेरिका पहले से ईरान संकट में उलझा है और यमन में नया मोर्चा खोलने से बचना चाहता है।
यही वजह है कि करीबी साझेदार होने के बावजूद ट्रंप ने कथित तौर पर MBS की मांग स्वीकार नहीं की।
फिलहाल अमेरिका सऊदी अरब को सैन्य और खुफिया सहयोग दे सकता है, लेकिन हूतियों पर सीधा हमला करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा।
अब सबसे बड़ी नजर **बाब अल-मंदेब, सऊदी तेल प्रतिष्ठानों और हूतियों की अगली कार्रवाई** पर रहेगी।
अगर संघर्ष और बढ़ता है तो MBS और ट्रंप के बीच हुई ये दो फोन कॉल आने वाले बड़े घटनाक्रम की भूमिका साबित हो सकती हैं।