न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के हाई-लेवल वीक के दौरान वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय संघर्षों, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, सदस्य देशों की जिम्मेदारी और राष्ट्रीय हितों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने रखे हैं। संयुक्त राष्ट्र का हाई-लेवल वीक 18 से 28 सितंबर तक आयोजित हो रहा है, जबकि महासभा की आम बहस 22 सितंबर से शुरू हुई।संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने ANI से बातचीत में कहा कि वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र, विशेष रूप से सुरक्षा परिषद की ताकत आखिरकार उसके सदस्य देशों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है।दुजारिक ने कहा, “शांति और सुरक्षा में UN की भूमिका, खासकर सुरक्षा परिषद के माध्यम से, उतनी ही मजबूत होती है जितने उसके सबसे मजबूत सदस्य देश होते हैं और जितनी मजबूती उसके सभी सदस्य देश उसे देना चाहते हैं।”
उन्होंने बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता पर उठ रहे सवालों के बीच अमेरिका के पूर्व राजदूत रिचर्ड होलब्रुक की एक पुरानी टिप्पणी का उदाहरण दिया। दुजारिक ने कहा कि अगर न्यूयॉर्क निक्स हारते हैं तो इसके लिए मैडिसन स्क्वायर गार्डन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनका आशय था कि संयुक्त राष्ट्र की सफलता या विफलता को केवल संस्था के स्तर पर नहीं देखा जा सकता, बल्कि सदस्य देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।दुजारिक ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्य देशों को कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति फिर से प्रतिबद्ध होने की जरूरत है। उन्होंने शक्ति के इस्तेमाल को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के मंगलवार को महासभा में दिए संदेश का भी जिक्र किया। गुटेरेस ने अपने संबोधन में कहा था कि दुनिया के सामने युद्ध और शांति, असमानता, जलवायु परिवर्तन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े चार बड़े सवाल हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग को मजबूत करने का आह्वान करते हुए चेतावनी दी थी कि वैश्विक विभाजन लगातार गहरा हो रहा है।संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता भी दोहराई। उन्होंने विशेष रूप से अफ्रीका को स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की स्थिति को अनुचित बताया। उनके मुताबिक मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बदलाव और व्यापक प्रतिनिधित्व जरूरी है।
दुजारिक की टिप्पणियां अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बुधवार को दिए गए बयानों के बाद सामने आईं। रुबियो ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मौजूदा क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि अगर दुनिया में विवादों और संघर्षों को प्रभावी तरीके से संभालने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रणाली मौजूद हो तो यह अच्छी बात होगी।रुबियो ने उदाहरण के तौर पर थाईलैंड और कंबोडिया के बीच तनाव, भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित संघर्ष, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और रवांडा से जुड़ी स्थिति तथा सूडान और ईरान से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया। उन्होंने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की क्षमता पर सवाल उठाते हुए राष्ट्रीय हितों की भूमिका पर जोर दिया।
इस बहस के केंद्र में यह सवाल है कि दुनिया में बढ़ते संघर्षों को रोकने या उनका समाधान करने में संयुक्त राष्ट्र और दूसरी बहुपक्षीय संस्थाएं कितनी प्रभावी हैं। संयुक्त राष्ट्र का पक्ष है कि संस्था की क्षमता काफी हद तक सदस्य देशों के सहयोग और विशेष रूप से सुरक्षा परिषद के सदस्यों की राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होती है।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच मतभेद होने पर कई मामलों में निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव भी पहले कह चुके हैं कि शांति अभियानों के लिए साधनों की कमी से अधिक समस्या अक्सर राजनीतिक समर्थन और सहमति की होती है।
महासभा के मौजूदा सत्र में संयुक्त राष्ट्र सुधार का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया है। 81वें सत्र के अध्यक्ष खलीलुर रहमान ने सत्र की शुरुआत में कहा था कि दुनिया 1945 की परिस्थितियों से काफी आगे बढ़ चुकी है और संयुक्त राष्ट्र को भी बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने की जरूरत है। इस सत्र की थीम भी वैश्विक विश्वास बहाल करने और परिवर्तन के बीच प्रभावी संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था विकसित करने पर केंद्रित है।महासभा अध्यक्ष ने यह भी कहा है कि जब सुरक्षा परिषद महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्रवाई नहीं कर पाती, तब पूरे संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। साथ ही उन्होंने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्व वाला, पारदर्शी और मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की आवश्यकता बताई है।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र नेतृत्व लगातार यह तर्क दे रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान बहुपक्षीय सहयोग को कमजोर करने के बजाय उसे अधिक प्रभावी बनाकर निकाला जाना चाहिए। गुटेरेस ने जून में संयुक्त राष्ट्र चार्टर की 81वीं वर्षगांठ पर कहा था कि संगठन में कमियां होने के बावजूद वैश्विक सहयोग के लिए उसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून और चार्टर के सिद्धांतों को चुनिंदा तरीके से लागू करने के खिलाफ भी चेतावनी दी थी।दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से सामने आया दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को वास्तविक संघर्षों को रोकने और विवादों का समाधान करने में अधिक प्रभावी होना चाहिए। रुबियो के बयान में राष्ट्रीय हितों और संप्रभु प्राथमिकताओं की भूमिका भी प्रमुख रही।
महासभा के हाई-लेवल वीक में सामने आई यह बहस केवल संयुक्त राष्ट्र की आलोचना या उसके बचाव तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और संप्रभु देशों के बीच जिम्मेदारियों का संतुलन किस तरह बनाया जाए।संयुक्त राष्ट्र की ओर से संदेश स्पष्ट है कि संस्था की प्रभावशीलता सदस्य देशों की प्रतिबद्धता से अलग नहीं हो सकती। वहीं अमेरिका की टिप्पणियां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की व्यावहारिक क्षमता पर सवाल उठा रही हैं। ऐसे में महासभा का मौजूदा सत्र बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार, अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन और सदस्य देशों की भूमिका पर जारी वैश्विक बहस का महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
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