ड्रोन हमलों से बचने के लिए पुलिस ने लगाया मछली पकड़ने वाला जाल
सुरक्षा विशेषज्ञ ने बताया सस्ता लेकिन नासमझी वाला तरीका
नई दिल्ली: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में ड्रोन हमलों से बचने के लिए पुलिस और सेना एक कम लागत वाला तरीका अपना रही है। संवेदनशील इलाकों में पुलिस चौकियों और सुरक्षा ठिकानों के ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए जा रहे हैं। सुरक्षाकर्मियों का मानना है कि हमलावर ड्रोन इन जालों में फंस सकते हैं और इससे हमले का नुकसान कम किया जा सकता है। हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञ इस तरीके को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानते। उनका कहना है कि असली हमले या सही परीक्षण के बिना नुकसान 40 से 50% तक कम होने के दावे की पुष्टि नहीं की जा सकती।
आतंकियों ने बदला हमले का तरीका
पाकिस्तानी पुलिस के मुताबिक, जाल लगाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि आतंकियों ने हमले करने का तरीका बदल दिया है। पहले जहां गोलीबारी और मोर्टार का इस्तेमाल ज्यादा होता था, वहीं अब ड्रोन का इस्तेमाल भी किया जा रहा है।
खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में 29 जुलाई को एक गंभीर हमला हुआ था। बम से भरे ड्रोन के जरिए पुलिस चौकी को निशाना बनाया गया। इस हमले में 11 पुलिसकर्मियों की मौत हुई थी। इसके बाद कई घंटे तक मुठभेड़ चली, जिसमें 15 हमलावर भी मारे गए। पुलिस के अनुसार, इस साल हंगू जिले में कम से कम 16 हमले हो चुके हैं। लगातार हो रही घटनाओं के कारण हंगू को प्रांत के संवेदनशील इलाकों में शामिल किया गया है।
चौकियों के ऊपर बनाई जा रही जालीदार छत
ड्रोन हमलों से बचने के लिए हंगू पुलिस ने पुलिस चौकियों पर मछली पकड़ने वाले जाल लगाना शुरू किया। ये जाल चौकी की छत और चारदीवारी के बीच जमीन से कई मीटर ऊपर लगाए गए हैं। इस तरह चौकी के ऊपर एक जालीदार छत जैसी संरचना तैयार हो जाती है। सुरक्षाकर्मियों का मानना है कि अगर कोई हमलावर ड्रोन ऊपर से चौकी की ओर आता है, तो वह इस जाल में फंस सकता है।
यह तरीका इसलिए भी अपनाया गया है क्योंकि इसे अपेक्षाकृत कम खर्च में लगाया जा सकता है। हंगू के जिला पुलिस अधिकारी तारिक हबीब के मुताबिक, एक सामान्य पुलिस चेकपोस्ट को इस तरह के जाल से ढकने में करीब 1.4 लाख रुपए खर्च होते हैं।
कई जिलों में लगाए जा रहे एंटी-ड्रोन जाल
यह व्यवस्था केवल हंगू जिले तक सीमित नहीं है। खैबर पख्तूनख्वा पुलिस के प्रवक्ता के मुताबिक, कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान समेत कम से कम पांच अन्य संवेदनशील जिलों में भी पुलिस चौकियों और चेकपोस्ट पर ऐसे जाल लगाए गए हैं।
प्रांत के कुछ हिस्सों में सेना के ठिकानों पर भी एंटी-ड्रोन जाल लगाए गए हैं। पुलिस इस योजना को आगे बढ़ाना चाहती है और इसके लिए प्रांतीय सरकार से अतिरिक्त धनराशि भी मांगी गई है।
सुरक्षा विशेषज्ञ ने बताया सस्ता लेकिन नासमझी वाला तरीका
इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक इम्तियाज गुल ने इस तरीके पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे नासमझी वाला सस्ता तरीका बताया। उनके अनुसार, आतंकियों का निशाना हमेशा पुलिस स्टेशन या चेकपोस्ट नहीं होते। ड्रोन का इस्तेमाल बड़े और महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए भी किया जाता है, ताकि हमले का असर ज्यादा हो और लोगों में डर पैदा किया जा सके। उनका मुख्य सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां किसी ड्रोन को हवा में उड़ते ही रोकने की क्षमता रखती हैं।
यूक्रेन में भी इस्तेमाल हो चुका है तरीका
पेशावर के आतंकवाद और सुरक्षा विशेषज्ञ फिदा अदील के मुताबिक, मछली पकड़ने वाले जाल से ड्रोन रोकने का तरीका नया नहीं है। सेना पहले से ही सामान और ठिकानों को छिपाने के लिए इस तरह के जाल का इस्तेमाल करती रही है। यूक्रेन में भी रूसी ड्रोन को रोकने के लिए ऐसे जाल इस्तेमाल किए गए हैं।
हालांकि, उनका कहना है कि विस्फोटक से भरे ड्रोन के खिलाफ जाल कितना प्रभावी होगा, यह उसके डिजाइन और जाल को किस तरीके से लगाया गया है, इस पर निर्भर करेगा। उन्होंने पुलिस के उस दावे पर भी सवाल उठाया कि जाल से नुकसान 40 से 50% तक कम हो सकता है। उनके मुताबिक, जब तक वास्तविक हमले या उचित परीक्षण नहीं होता, तब तक इस आंकड़े की पुष्टि करना संभव नहीं है।
इस तरह पाकिस्तान में ड्रोन हमलों से बचने के लिए कम खर्च वाले इस तरीके को अपनाया जा रहा है, लेकिन इसकी वास्तविक प्रभावशीलता को लेकर सुरक्षा विशेषज्ञों की राय अभी पूरी तरह सकारात्मक नहीं है।