नई दिल्ली: सऊदी अरब पर हूथी विद्रोहियों के हालिया हमलों ने पाकिस्तान के रुख में एक साफ़ विरोधाभास उजागर किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद ने सामूहिक सुरक्षा (collective defence) का ज़िक्र तो किया है, लेकिन सैन्य कार्रवाई का कोई वादा करने से बचता रहा है। ऐसा लगता है कि वह रियाद के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बचाए रखना चाहता है और साथ ही खुद को किसी और क्षेत्रीय युद्ध से दूर रखना चाहता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हूथी हमलों पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया ने 'मक्का समझौते' की व्यावहारिक उपयोगिता पर एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है: क्या इस्लामाबाद तब कार्रवाई करने के लिए तैयार है जब किसी संधि-साझेदार की सुरक्षा पर सीधा खतरा हो?
7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत "तीनों देशों में से किसी एक पर भी होने वाले किसी भी सशस्त्र हमले को उन सभी पर हमला माना जाएगा।"
'द अर्थ न्यूज़' की एक रिपोर्ट के अनुसार, "एक ऐसे समझौते के लिए जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि एक सदस्य पर हमले से सभी सदस्यों को चिंतित होना चाहिए, पाकिस्तान का अब तक का व्यवहार काफी सतर्क रहा है। इस्लामाबाद ने हमलों की निंदा की है, हूथियों को चेतावनी दी है कि सऊदी अरब के खिलाफ आक्रामकता से समझौता लागू हो सकता है, और रियाद के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। लेकिन उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हो रही है।"
8 सितंबर को पाकिस्तान ने हूथियों को चेतावनी दी कि सऊदी अरब पर हमले से मक्का समझौते का सामूहिक-रक्षा प्रावधान लागू हो सकता है। लेकिन इसके बाद उसकी इस स्पष्टीकरण ने कि सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हो रही है, इस बात पर सवाल खड़े कर दिए कि व्यवहार में सामूहिक-सुरक्षा का यह वादा किस हद तक लागू होता है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया, "इस शर्त ने व्यवस्था से जुड़ी मुख्य अस्पष्टता को उजागर कर दिया है। अगर यह समझौता मुख्य रूप से एक राजनीतिक प्रतिबद्धता है, तो इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया पारंपरिक राजनयिक रुख के अनुरूप है। हालाँकि, अगर इसका मकसद एक वास्तविक सामूहिक-रक्षा तंत्र के रूप में काम करना है, तो किसी भी घोषित सैन्य योगदान का न होना इस बात पर सवाल उठाता है कि गंभीर संघर्ष के दौरान यह प्रतिबद्धता कैसे काम करेगी।"
रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद के लिए सैन्य भागीदारी से दूर रहना उसके तात्कालिक राष्ट्रीय हितों के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन यह सामूहिक-रक्षा प्रतिबद्धता की विश्वसनीयता पर भी एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है, खासकर तब जब किसी सदस्य पर सीधा हमला हो। “सामूहिक सुरक्षा की भाषा जितनी व्यापक होगी, सदस्यों से उतनी ही ज़्यादा उम्मीद की जाएगी कि जब किसी दूसरे सदस्य पर खतरा हो, तो वे कार्रवाई करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों दिखाएं। सिर्फ़ कूटनीतिक निंदा से यह भरोसा कायम नहीं हो सकता। हो सकता है कि पाकिस्तान को वह फ़ैसला लिए बिना ही तत्काल संकट टल जाए। लेकिन इससे उठा सवाल बना रहेगा: जब सामूहिक सुरक्षा महज़ राजनीतिक घोषणा न रहकर एक वास्तविक सैन्य दायित्व बन जाएगी, तो पाकिस्तान आख़िर कहाँ लक्ष्मण रेखा खींचेगा?” रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया।
रिपोर्ट में कहा गया, “जब तक इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल जाता, तब तक मक्का समझौता सामूहिक सुरक्षा की एक साबित गारंटी के बजाय राजनीतिक और रक्षात्मक तालमेल के एक ढांचे के तौर पर ही ज़्यादा मज़बूत बना रहेगा।”
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