जिनेवा। जम्मू-कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता जावेद अहमद बेग ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बाल्टिस्तान में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाया है। उन्होंने पाकिस्तानी प्रशासन और सुरक्षा बलों पर स्थानीय कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा, हिरासत और आतंकवाद-रोधी कानूनों के कथित दुरुपयोग के आरोप लगाए। पाकिस्तान की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर तत्काल प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं थी।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का 63वां नियमित सत्र जिनेवा के पैलेस ऑफ नेशंस में 7 सितंबर से 7 अक्टूबर 2026 तक आयोजित हो रहा है। इसी सत्र के दौरान बेग ने गिलगित-बाल्टिस्तान से जुड़े मुद्दों को उठाया।
ANI से बातचीत में बेग ने गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर भारत के दावे को दोहराते हुए कहा कि यह जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है और पाकिस्तान ने 1947 से इस पर अवैध कब्जा कर रखा है। गिलगित-बाल्टिस्तान की संप्रभुता और राजनीतिक स्थिति भारत-पाकिस्तान विवाद का हिस्सा है; भारत पूरे पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर रियासत पर दावा करता है, जबकि यह क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान के प्रशासन में है।बेग ने कहा कि उन्होंने UNHRC के 63वें सत्र में गिलगित-बाल्टिस्तान में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और पाकिस्तानी प्रशासन तथा सुरक्षा बलों की कथित कार्रवाई का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को वहां की परिस्थितियों और स्थानीय लोगों से जुड़े मामलों की जानकारी होनी चाहिए। उनके ये आरोप ANI की रिपोर्टिंग में दर्ज किए गए हैं।
बेग ने विशेष रूप से अवामी एक्शन कमेटी के सदस्यों की हिरासत का मामला उठाया। उन्होंने एडवोकेट एहसान अली और उनके साथियों का जिक्र करते हुए दावा किया कि उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखा गया। ANI की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, बेग ने UNHRC में कहा था कि अवामी एक्शन कमेटी के अध्यक्ष एडवोकेट एहसान अली और कई अन्य सदस्यों को तीन महीने से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था।उन्होंने एहसान अली को करीब 70 वर्षीय वरिष्ठ वकील बताते हुए उनकी हिरासत पर सवाल उठाया। बेग के अनुसार, अवामी एक्शन कमेटी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों से जुड़ा समूह है और वह क्षेत्र के स्थानीय मुद्दों को उठाता रहा है।
बेग ने आरोप लगाया कि अवामी एक्शन कमेटी से जुड़े कार्यकर्ताओं के खिलाफ पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी कानून का इस्तेमाल किया गया। एक अन्य ANI रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने एहसान अली के साथ नुसरत हुसैन, महबूब वली, नफीस और मेहर अली का भी नाम लिया और कहा कि उन्हें पाकिस्तान के Anti-Terrorism Act, 1997 की Fourth Schedule के तहत रखा गया।Fourth Schedule आतंकवाद-रोधी कानून के तहत सूचीबद्ध व्यक्तियों पर निगरानी और विभिन्न प्रतिबंध लगाए जाने से संबंधित प्रावधान है। बेग ने आरोप लगाया कि इस कानून का इस्तेमाल गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में असहमति की आवाजों को दबाने के लिए किया जा रहा है। यह बेग का आरोप है और इसे स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बेग ने कहा कि अवामी एक्शन कमेटी के नेताओं को कथित तौर पर राज्य के खिलाफ हिंसा भड़काने जैसे आरोपों में हिरासत में लिया गया था। उन्होंने इन आरोपों को गलत बताते हुए दावा किया कि आतंकवाद-रोधी कानून का इस्तेमाल शांतिपूर्ण राजनीतिक और नागरिक गतिविधियों के खिलाफ किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कई नेताओं को बाद में रिहा कर दिया गया, लेकिन बेग का आरोप है कि कानून के प्रावधानों के जरिए कार्यकर्ताओं पर दबाव जारी है।उन्होंने एक किशोर रेयान अली का मामला भी उठाया। बेग ने एक तस्वीर दिखाते हुए आरोप लगाया कि किशोर को गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तानी रेंजर्स और प्रशासन की कार्रवाई के दौरान गोली मारी गई थी। इस विशिष्ट घटना के बारे में बेग के आरोप की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे उनके दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
बेग ने कहा कि उनका उद्देश्य गिलगित-बाल्टिस्तान के नागरिकों से जुड़े मानवाधिकार मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने लाना है। उन्होंने UNHRC से वहां के कार्यकर्ताओं की हिरासत और आतंकवाद-रोधी कानूनों के कथित दुरुपयोग पर ध्यान देने की मांग की।जिनेवा में मानवाधिकार परिषद का मौजूदा सत्र दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों की स्थिति पर चर्चा का मंच बना हुआ है। आधिकारिक UNHRC कार्यक्रम के मुताबिक 63वें सत्र में सदस्य देशों, पर्यवेक्षकों, गैर-सरकारी संगठनों और मानवाधिकार संस्थाओं को विभिन्न विषयों पर अपनी बात रखने का अवसर मिल रहा है।
बेग का बयान ऐसे समय आया है जब गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय अधिकारों, आर्थिक मुद्दों और प्रशासनिक नीतियों को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। अवामी एक्शन कमेटी भी स्थानीय मुद्दों को लेकर सक्रिय संगठनों में शामिल रही है।उन्होंने पाकिस्तान से नागरिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानूनों के कथित दुरुपयोग को रोकने की मांग की। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से ऐसे मामलों पर नजर रखने और हिरासत में लिए गए या प्रतिबंधों का सामना कर रहे कार्यकर्ताओं के मामलों पर ध्यान देने की अपील की।
बेग की ओर से लगाए गए आरोपों में हिरासत, कानूनी प्रतिबंध और सुरक्षा बलों की कथित हिंसा प्रमुख मुद्दे रहे। हालांकि इन दावों के संबंध में पाकिस्तानी प्रशासन का पक्ष भी महत्वपूर्ण है और आरोपों की स्वतंत्र जांच के बाद ही घटनाओं की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।UNHRC के 63वें सत्र में बेग की ओर से उठाया गया गिलगित-बाल्टिस्तान का मुद्दा एक बार फिर क्षेत्र में मानवाधिकार और राजनीतिक अधिकारों को लेकर चल रही बहस को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लेकर आया है। परिषद का मौजूदा सत्र 7 अक्टूबर तक जारी रहेगा, जहां विभिन्न देशों और क्षेत्रों से जुड़े मानवाधिकार मामलों पर चर्चा हो रही है।