टोक्यो: जापान ने मंगल ग्रह के चंद्रमा फोबोस से सतह के नमूने एकत्र कर धरती पर लाने के उद्देश्य से अपना महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन लॉन्च कर दिया है। जापानी अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के ‘मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन’ यानी एमएमएक्स अंतरिक्ष यान ने एच3 रॉकेट से उड़ान भरी। प्रक्षेपण जापान के तानेगाशिमा अंतरिक्ष केंद्र से स्थानीय समय के अनुसार मंगलवार, 20 अक्टूबर की सुबह हुआ। मिशन सफल रहा तो वैज्ञानिकों को पहली बार मंगल के किसी चंद्रमा से लाए गए पदार्थ का धरती की प्रयोगशालाओं में अध्ययन करने का अवसर मिलेगा। 

मंगल की सतह पर नहीं उतरेगा मुख्य अभियान
इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य मंगल ग्रह की सतह से मिट्टी उठाना नहीं, बल्कि उसके चंद्रमा फोबोस से नमूने जुटाना है। मंगल के दो प्राकृतिक चंद्रमा हैं—फोबोस और डीमोस। एमएमएक्स दोनों का अध्ययन करेगा, लेकिन नमूना संग्रह के लिए फोबोस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। फोबोस की सतह पर मौजूद धूल और छोटे चट्टानी कणों की परत को वैज्ञानिक भाषा में ‘रेगोलिथ’ कहा जाता है। आम बोलचाल में इसे मिट्टी कहा जा सकता है, लेकिन इसकी प्रकृति धरती की उपजाऊ मिट्टी जैसी मान लेना सही नहीं होगा।
करीब एक वर्ष बाद मंगल तक पहुंचेगा यान
योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यान लगभग एक वर्ष की यात्रा के बाद अगस्त 2027 में मंगल की कक्षा में पहुंचेगा। इसके बाद सितंबर से फोबोस के आसपास विशेष कक्षा में रहकर विस्तृत निरीक्षण की योजना है। यान सतह की तस्वीरें लेने, उसकी बनावट समझने और उपयुक्त उतरने के स्थान खोजने का काम करेगा। नमूने लेने से पहले इस तरह का निरीक्षण जरूरी है, क्योंकि फोबोस की सतह और वहां उतरने की परिस्थितियों के बारे में अभी सीमित जानकारी है। मिशन का प्रत्येक अगला चरण पिछले चरण की सफलता पर निर्भर करेगा। 
साथ गया है छोटा रोवर आइडफिक्स
एमएमएक्स के साथ जर्मनी और फ्रांस द्वारा विकसित ‘आइडफिक्स’ रोवर भी भेजा गया है। इसे जर्मन एयरोस्पेस सेंटर और फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने मिलकर तैयार किया है। रोवर को 2028 के अंत या 2029 की शुरुआत के आसपास फोबोस पर उतारने की योजना है। यह लगभग 100 दिन तक सतह की जांच करेगा। इसका काम वहां के पदार्थ, बनावट और चलने की परिस्थितियों को समझना होगा। रोवर से मिलने वाली जानकारी मुख्य अंतरिक्ष यान के उतरने और नमूने लेने की तैयारी में सहायक होगी।
कम गुरुत्वाकर्षण में उतरना बड़ी चुनौती
फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण धरती के मुकाबले बेहद कमजोर है। ऐसे वातावरण में उतरना और पहियों के सहारे चलना सामान्य रोबोटिक अभियान से अलग चुनौती पेश करता है। रोवर को सतह पर पहुंचने के बाद अपनी स्थिति ठीक करने और सौर पैनल खोलने जैसे काम स्वयं करने होंगे। धरती से संकेत पहुंचने में लगने वाला समय भी महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक हर छोटी गतिविधि को तत्काल नियंत्रित नहीं कर सकेंगे। इसलिए यान और रोवर में स्वचालित निर्णय तथा सुरक्षित संचालन की क्षमताएं महत्वपूर्ण रहेंगी।
दो बार उतरकर नमूने जुटाने की योजना
जाक्सा की योजना के अनुसार, मुख्य यान फोबोस की सतह पर दो सॉफ्ट लैंडिंग के जरिए नमूने एकत्र करेगा। मिशन का लक्ष्य 10 ग्राम से अधिक पदार्थ धरती पर लाना है। मात्रा छोटी जरूर लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन के लिए ऐसे नमूने महत्वपूर्ण हो सकते हैं। फोबोस के आसपास अध्ययन पूरा करने के बाद यान मंगल के दूसरे चंद्रमा डीमोस का निरीक्षण भी करेगा। इसके बाद 2030 में वापसी यात्रा शुरू करने और 2031 में नमूनों वाला कैप्सूल धरती पर पहुंचाने की योजना है। कैप्सूल को ऑस्ट्रेलिया में प्राप्त किया जाएगा। 
कैसे बने मंगल के दोनों चंद्रमा?
मिशन जिन बड़े सवालों का जवाब तलाशेगा, उनमें फोबोस और डीमोस की उत्पत्ति प्रमुख है। एक संभावना यह है कि वे क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने अपनी कक्षा में पकड़ लिया। दूसरी संभावना के अनुसार, मंगल पर किसी विशाल टक्कर से निकला मलबा इकट्ठा होकर चंद्रमा बना। इन संभावनाओं के बीच अंतर समझने के लिए नमूनों की संरचना और रासायनिक विशेषताएं उपयोगी होंगी। केवल दूर से ली गई तस्वीरों की तुलना में वास्तविक पदार्थ का परीक्षण वैज्ञानिकों को अधिक प्रकार के विश्लेषण करने का अवसर देगा।
जल और सौरमंडल के इतिहास पर मिल सकते हैं संकेत
वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि चट्टानी ग्रहों तक पानी और कार्बनिक पदार्थ कैसे पहुंचे। मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति का अध्ययन इस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है। हालांकि, मिशन का उद्देश्य सीधे जीवन खोज लेना या उसकी मौजूदगी साबित करना नहीं है। अध्ययन से मंगल और शुरुआती सौरमंडल के विकास की समझ बेहतर हो सकती है। नमूने मिलने के बाद उनका वर्गीकरण और विस्तृत परीक्षण किया जाएगा। इनसे मिलने वाले निष्कर्षों के लिए वैज्ञानिकों को प्रमाणों का सावधानी से मूल्यांकन करना होगा। 
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से आगे बढ़ रहा अभियान
जापान के नेतृत्व वाले इस मिशन में नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, फ्रांस और जर्मनी की भागीदारी है। अलग-अलग संस्थाएं उपकरणों और तकनीकी विशेषज्ञता के जरिए योगदान दे रही हैं। प्रक्षेपण अभियान की पहली महत्वपूर्ण सफलता है। अब लंबी यात्रा, कक्षा में प्रवेश, सुरक्षित लैंडिंग, नमूना संग्रह और धरती पर वापसी जैसे कठिन चरण बाकी हैं। सभी चरण सफल रहने पर एमएमएक्स मंगल के चंद्रमाओं को समझने की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि बन सकता है।
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