जिनेवा : 27 अक्टूबर 2026। चीन में तिब्बती और उइगर समुदायों के मानवाधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं बढ़ रही हैं। स्विट्जरलैंड और चीन के बीच हाल ही में आयोजित 19वें द्विपक्षीय मानवाधिकार संवाद में तिब्बत और शिनजियांग के अल्पसंख्यकों की स्थिति को प्रमुखता से उठाया गया। स्विट्जरलैंड ने चीन के नए जातीय एकता कानून और अल्पसंख्यकों की भाषाई, सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता पर उसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी चीन की नीतियों को लेकर चिंता व्यक्त की है।
स्विट्जरलैंड और चीन के बीच मानवाधिकारों पर चर्चा
स्विट्जरलैंड और चीन के बीच 19वां द्विपक्षीय मानवाधिकार संवाद 19 और 20 अक्टूबर 2026 को आयोजित हुआ। मुख्य बैठक 20 अक्टूबर को स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में हुई।स्विस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय की शांति और मानवाधिकार विभाग की उपप्रमुख डागमार श्मिट टार्टाग्ली ने किया। वहीं चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय संगठन विभाग के उपमहानिदेशक युआन युआन ने किया।दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।स्विट्जरलैंड ने विशेष रूप से तिब्बती और उइगर समुदायों की स्थिति, हांगकांग के घटनाक्रम तथा चीन के नए जातीय एकता कानून को लेकर चिंता जताई।
तिब्बती और उइगर समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि चीन के तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियों, स्थानीय भाषाओं तथा सांस्कृतिक परंपराओं पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।तिब्बत में बौद्ध धार्मिक संस्थानों, मठों और पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है।वहीं शिनजियांग में उइगर मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता, हिरासत केंद्रों और सरकारी निगरानी को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की वर्ष 2022 की रिपोर्ट में शिनजियांग में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि कुछ उल्लंघन मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं।
चीन के नए जातीय एकता कानून पर भी चिंता
चीन में 1 जुलाई 2026 से लागू जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले कानून को लेकर भी विवाद बढ़ा है।मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, इस कानून के कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक समुदायों की भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रभावित कर सकते हैं।विशेष रूप से मंदारिन भाषा को शिक्षा में प्राथमिकता देने तथा बच्चों की सांस्कृतिक पहचान पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए हैं।संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति ने चीन से पूछा है कि नया कानून तिब्बती, उइगर और अन्य अल्पसंख्यक बच्चों के अपनी भाषा बोलने, धार्मिक परंपराओं का पालन करने और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के अधिकारों के अनुरूप कैसे है।
बच्चों की शिक्षा और परिवारों से अलगाव का मुद्दा
मानवाधिकार विशेषज्ञों ने तिब्बती और उइगर बच्चों की शिक्षा व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त की है।संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार समिति ने आवासीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति, परिवारों से दूरी और स्थानीय भाषाओं में शिक्षा की उपलब्धता को लेकर चीन से जानकारी मांगी है।समिति ने यह भी सवाल उठाया है कि बच्चों को उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के कारण किसी तरह के भेदभाव का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है।चीन को इन सवालों पर 15 फरवरी 2027 तक लिखित जवाब देने के लिए कहा गया है।
चीन ने आरोपों को किया खारिज
चीन की सरकार पहले भी शिनजियांग और तिब्बत में मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों से इनकार करती रही है।बीजिंग का कहना है कि शिनजियांग में उसकी नीतियां आतंकवाद, अलगाववाद और धार्मिक उग्रवाद से निपटने के लिए बनाई गई हैं।चीन सरकार का दावा है कि देश में विभिन्न जातीय समूहों को कानून के तहत समान अधिकार प्राप्त हैं और उसकी नीतियों का उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है।हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इन दावों की स्वतंत्र जांच और प्रभावित क्षेत्रों में पारदर्शिता बढ़ाने की मांग करते रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की निगरानी जारी
सितंबर 2026 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र के दौरान भी तिब्बत और शिनजियांग से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे।आयरलैंड, जापान, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा चीन के नए जातीय एकता कानून को लेकर चिंता व्यक्त की थी।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने भी तिब्बती समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर बढ़ते प्रतिबंधों को चिंताजनक बताया था।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर चीन के अगले कदम पर
तिब्बती और उइगर समुदायों के अधिकारों का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।स्विट्जरलैंड और चीन के बीच मानवाधिकार संवाद से दोनों देशों को अपनी चिंताओं और नीतियों पर चर्चा करने का अवसर मिला है।अब संयुक्त राष्ट्र की संबंधित समितियों के समक्ष चीन की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले जवाबों पर नजर रहेगी। इन जवाबों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि अल्पसंख्यकों की धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को लेकर बीजिंग क्या स्पष्टीकरण देता है।