नई दिल्ली: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा समझौता लागू होने के बाद ईरान ने इसकी आलोचना तेज़ कर दी है। ईरान ने चेतावनी दी है कि यमन के मामले में किसी भी तरह के दखल के इस क्षेत्र के लिए बुरे नतीजे हो सकते हैं।
'ईरान इंटरनेशनल' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे पर हूथी मिसाइल और ड्रोन हमलों के बढ़ने के बाद 5 अक्टूबर को यह तीन देशों वाला समझौता लागू हुआ। तुर्की और पाकिस्तान ने कहा कि उन्होंने सऊदी अरब की मदद के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई से जब उन खबरों के बारे में पूछा गया कि सऊदी अरब में हज़ारों पाकिस्तानी सैनिक तैनात किए जा सकते हैं, तो उन्होंने कहा: "हमने भी यह अफवाह सुनी है, और हमें उम्मीद है कि यह सच नहीं है।"
उन्होंने कहा, "इस क्षेत्र के देश अच्छी तरह जानते हैं कि यमन के मामले में किसी भी तरह के दखल के इस क्षेत्र के लिए बुरे नतीजे हो सकते हैं।" उन्होंने उम्मीद जताई कि मक्का समझौते जैसे समझौतों का इस्तेमाल "मुस्लिम समुदाय के हितों और भलाई के खिलाफ" नहीं किया जाएगा।
विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सीधे तौर पर समझौते का ज़िक्र किए बिना पड़ोसी देशों से "आत्मनिर्भरता" और "सच्चे भाईचारे" पर आधारित नीति अपनाने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे समझौते ईरान को रोक नहीं पाएंगे।
ईरान के कई सांसदों ने इस समझौते को काफी हद तक दिखावटी बताया। संसद के राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के सदस्य अहमद बख्शायेश ने इसे "कागज़ी और राजनीतिक समझौता" करार दिया।
समिति के एक अन्य सदस्य इब्राहिम रेज़ाई ने और भी कड़ी आलोचना की और सऊदी अरब की सुरक्षा की गारंटी देने की समझौते की क्षमता पर सवाल उठाए।
उन्होंने 'X' पर लिखा, "सऊदी अरब को पता होना चाहिए कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ कागज़ी समझौते से उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी, ठीक वैसे ही जैसे सालों तक अमेरिकियों द्वारा एकतरफा फायदा उठाने से उन्हें सुरक्षा नहीं मिली थी। अपनी नीतियां सुधारें ताकि आपको सुरक्षा के लिए दूसरों के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े।"
ईरान की आलोचना तुर्की के बजाय पाकिस्तान पर ज़्यादा केंद्रित रही है, जिसकी मुख्य वजह तेहरान और वाशिंगटन के बीच मध्यस्थता में इस्लामाबाद की अहम भूमिका है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के सांसद अहमद नादेरी ने पाकिस्तान की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने X पर लिखा कि "यमन के लोगों के खिलाफ सऊदी अरब के साथ मिलकर पाकिस्तान का युद्ध में शामिल होना... यह दिखाता है कि पाकिस्तान को अब मध्यस्थ नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर दखल देने वाला देश माना जाना चाहिए।"
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ईरान के सरकारी मीडिया ने इस समझौते के लागू होने की आलोचना की है और साथ ही तुर्की और पाकिस्तान को हुथी अधिकारियों की तरफ से दी गई चेतावनियों को भी प्रमुखता से दिखाया है।
तस्नीम ने इस घटनाक्रम को "यमन के लोगों के खिलाफ सऊदी युद्ध में तुर्की और पाकिस्तान का शामिल होना" बताया, जबकि ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के करीबी माने जाने वाले नूर न्यूज़ ने समझौते के मकसद पर सवाल उठाते हुए पूछा: "मक्का गठबंधन या यमन के पीड़ित लोगों के खिलाफ गठबंधन?!"
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