नई दिल्ली : 5 नवंबर। भारत की प्राचीन सभ्यता, साहित्य और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत के तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों की ऐतिहासिक पांडुलिपियों को शामिल किया गया है। इनमें महर्षि वेदव्यास से संबंधित महाभारत, आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र और कश्मीरी इतिहासकार कल्हण की राजतरंगिणी शामिल हैं।यह उपलब्धि भारतीय साहित्यिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन तीनों ग्रंथों ने सदियों से भारतीय समाज, शासन व्यवस्था, राजनीति, दर्शन और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रभावित किया है।केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने इसे भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत और प्राचीन ज्ञान परंपरा को मिली महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मान्यता बताया। संस्कृति मंत्रालय ने भी इस उपलब्धि को देश के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया है।
महाभारत की प्राचीन पांडुलिपि को मिली पहचान
महाभारत भारतीय साहित्य और संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण महाकाव्य है। इसे महर्षि वेदव्यास से संबंधित माना जाता है। यह केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि धर्म, न्याय, कर्तव्य, राजनीति, नैतिकता और मानवीय जीवन के अनेक पहलुओं का विस्तृत वर्णन करता है।महाभारत में वर्णित घटनाएं और विचार भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। इसके भीतर शामिल भगवद्गीता जीवन, कर्म और आध्यात्मिक दर्शन से संबंधित महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्रस्तुत करती है।यूनेस्को के क्षेत्रीय रजिस्टर के लिए महाभारत की एक दुर्लभ भोजपत्र पांडुलिपि को प्रस्तुत किया गया था। लगभग 400 वर्ष पुरानी यह पांडुलिपि शारदा लिपि में लिखी गई है और पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित है।इस पांडुलिपि का संबंध महाभारत की प्राचीन कश्मीरी पाठ परंपरा से है। ऐतिहासिक और साहित्यिक अध्ययन के लिए इसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।महाभारत का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं रहा। इसके कथानक और पात्र दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों की साहित्यिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं में भी दिखाई देते हैं। इंडोनेशिया, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे देशों की कला और लोकपरंपराओं में महाभारत की छाप मिलती है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र आज भी प्रासंगिक
यूनेस्को के क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल दूसरा महत्वपूर्ण भारतीय ग्रंथ कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। कौटिल्य को चाणक्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें प्राचीन भारत के प्रमुख राजनीतिक विचारकों और प्रशासनिक रणनीतिकारों में गिना जाता है।अर्थशास्त्र में शासन व्यवस्था, आर्थिक नीति, कर प्रणाली, कानून, न्याय, प्रशासन, विदेश नीति, कूटनीति और सुरक्षा से संबंधित विस्तृत विचार प्रस्तुत किए गए हैं।यह ग्रंथ बताता है कि किसी राज्य को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए प्रशासनिक दक्षता, आर्थिक स्थिरता और न्याय व्यवस्था कितनी आवश्यक है।अर्थशास्त्र में राजा के कर्तव्यों के साथ-साथ प्रजा के कल्याण को भी विशेष महत्व दिया गया है। इसमें राज्य की सुरक्षा, खुफिया व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर भी महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलते हैं।यूनेस्को की नामांकन संबंधी जानकारी के अनुसार, अर्थशास्त्र की 16वीं शताब्दी की एक संपूर्ण ताड़पत्र पांडुलिपि मैसूर के ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में सुरक्षित है। वर्ष 1905 में आर. शामाशास्त्री ने इस ग्रंथ को आधुनिक विद्वत जगत के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
राजतरंगिणी में मिलता है कश्मीर का ऐतिहासिक विवरण
तीसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ कल्हण की राजतरंगिणी है। इसकी रचना 12वीं शताब्दी में संस्कृत भाषा में की गई थी। राजतरंगिणी को कश्मीर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है।इस ग्रंथ में कश्मीर के विभिन्न शासकों, राजवंशों, राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन का वर्णन मिलता है।राजतरंगिणी की विशेषता यह है कि इसमें इतिहास को केवल कथाओं के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं और उपलब्ध स्रोतों के आधार पर क्रमबद्ध विवरण देने का प्रयास किया गया है।कल्हण ने अपने लेखन में पूर्ववर्ती स्रोतों और ऐतिहासिक परंपराओं का उपयोग किया। इस कारण राजतरंगिणी भारतीय इतिहास लेखन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है।यूनेस्को के क्षेत्रीय रजिस्टर के लिए प्रस्तुत राजतरंगिणी की पांडुलिपि श्रीनगर की ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में संरक्षित है। यह शारदा लिपि में पुराने कश्मीरी कागज पर लिखी गई है।इस पांडुलिपि का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह कश्मीर के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन के लिए एक मूल्यवान स्रोत है।
क्या है यूनेस्को का ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ कार्यक्रम?
यूनेस्को ने वर्ष 1992 में ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य विश्व की महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत का संरक्षण करना और उसके ऐतिहासिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्राचीन पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों, अभिलेखों और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री को मान्यता दी जाती है।इसमें राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अलग-अलग रजिस्टर होते हैं। भारत के इन तीन ग्रंथों से संबंधित पांडुलिपियों को एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया है। इसे यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ रजिस्टर से अलग समझना जरूरी है।
पहले भी भारतीय ग्रंथों को मिल चुकी है मान्यता
भारतीय साहित्यिक विरासत को इससे पहले भी यूनेस्को के इस कार्यक्रम के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान मिल चुका है।वर्ष 2024 में रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोचन से संबंधित पांडुलिपियों को एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया था।इसके अतिरिक्त वर्ष 2025 में भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र की पांडुलिपियों को यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ रजिस्टर में स्थान मिला था।
भारतीय संस्कृति के संरक्षण को मिलेगी मजबूती
महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को मिली नई पहचान भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और अध्ययन को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।इस उपलब्धि से प्राचीन भारतीय साहित्य, इतिहास और राजनीतिक चिंतन के प्रति अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की रुचि बढ़ने की संभावना है।साथ ही दुर्लभ पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, संरक्षण और अध्ययन को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।इन तीनों ग्रंथों की विशेषता यह है कि वे भारतीय सभ्यता के अलग-अलग पक्षों को सामने रखते हैं। महाभारत मानवीय मूल्यों और दर्शन का व्यापक परिचय देता है, अर्थशास्त्र शासन और प्रशासन की समझ विकसित करता है, जबकि राजतरंगिणी इतिहास लेखन की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।इन पांडुलिपियों को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान इस बात को रेखांकित करता है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा आज भी विश्व की साझा सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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