नई दिल्ली: भारत ने रूस और ईरान से जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर वॉशिंगटन के सामने अपनी चिंता दर्ज कराई है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने हाल में भारत आए अमेरिकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल के सामने कहा कि रूस और ईरान से ऊर्जा खरीदने वाले देशों को निशाना बनाने वाली नई अमेरिकी व्यवस्था भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार दोनों पर असर डाल सकती है।
अमेरिका में हाल में पारित Sanctioning Russia and Iran Act 2026
के तहत राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है, जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदते हैं। भारत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। इसी वजह से नई व्यवस्था को लेकर नई दिल्ली ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों पर संभावित असर का मुद्दा उठाया है।
भारत की ओर से अमेरिकी पक्ष को यह भी बताया गया कि उसकी ऊर्जा खरीद किसी एक देश के समर्थन या विरोध पर आधारित नहीं है, बल्कि घरेलू जरूरत, कीमत और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कारकों से तय होती है। नई दिल्ली पहले भी यह कहती रही है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगी।
रूस से भारत की तेल खरीद पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है और यह देश की ऊर्जा जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में अमेरिकी टैरिफ या दूसरे प्रतिबंध भारत की आयात लागत और ऊर्जा बाजार पर सीधा दबाव डाल सकते हैं। नई दिल्ली की चिंता यह भी है कि इस तरह के कदम वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों और सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकते हैं।
ईरान को लेकर भी भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक हित हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का अहम रास्ता है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों में बढ़ोतरी से इस परियोजना और क्षेत्रीय संपर्क योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका बनी रहती है।
भारत ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से बातचीत में यह संकेत दिया कि प्रतिबंधों की नीति अगर भारतीय हितों को सीधे प्रभावित करती है तो इसका असर व्यापक द्विपक्षीय रिश्तों पर भी पड़ सकता है। हालांकि अमेरिका ने भारत की आपत्तियों को लेकर कहा है कि दोनों देशों के बीच संबंध कई क्षेत्रों में मजबूत हैं और बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं।
यह मुद्दा ऐसे समय सामने आया है जब भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। दूसरी ओर रूस भारत का पुराना रक्षा और ऊर्जा साझेदार बना हुआ है। ऐसे में नई दिल्ली के सामने अपने अलग-अलग रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर भी हाल में वैश्विक मंचों पर ऊर्जा, खाद्य, उर्वरक और वित्तीय संकट को लेकर सप्लाई चेन को विविध बनाने और किसी एक व्यवस्था पर निर्भरता कम करने की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। उन्होंने कहा है कि वैश्विक तनाव के दौर में देशों को अपनी ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिक विकल्प विकसित करने होंगे। फिलहाल भारत का रुख साफ है कि रूस और ईरान के साथ उसके आर्थिक संबंध राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर तय होंगे। अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखते हुए नई दिल्ली यह सुनिश्चित करना चाहती है कि किसी भी नई प्रतिबंध व्यवस्था का भारतीय अर्थव्यवस्था, ऊर्जा जरूरतों और द्विपक्षीय रिश्तों पर प्रतिकूल असर न पड़े।
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