इस्लामाबाद: एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भले ही पाकिस्तान में औपचारिक रूप से नागरिक सरकार है, लेकिन सेना ही सबसे ताकतवर राजनीतिक संस्था बनी हुई है। रिपोर्ट में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा की गिरफ़्तारी देश में संवैधानिक उल्लंघनों और सरकारी सत्ता के दुरुपयोग के एक बड़े पैटर्न को दिखाती है।
कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार, 24 जनवरी को ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और उनके पति हादी अली चट्टा को "साइबर आतंकवाद" और "गलत जानकारी" फैलाने के आरोप में 17 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई। उन्होंने सोशल मीडिया पर बलूच और पश्तून कार्यकर्ताओं के साथ एकजुटता दिखाई थी, जिन्होंने पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया था और पाकिस्तानी सेना की आलोचना की थी। इस मामले में प्रक्रियात्मक खामियां और जोड़े को दी गई सज़ा की गंभीरता पाकिस्तान की न्यायपालिका में हो रहे गहरे संवैधानिक बदलावों और सरकारी सत्ता के विस्तार को दिखाती है।
अनाया कय्यूम ने कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू में लिखा, "उनकी गिरफ़्तारी संवैधानिक उल्लंघनों और सरकारी सत्ता के दुरुपयोग के एक बड़े पैटर्न को दिखाती है। हालांकि पाकिस्तान औपचारिक रूप से नागरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत काम करता है, लेकिन सेना देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक संस्था बनी हुई है। नागरिक नेता पद पर तो रहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, विदेश मामलों और अहम राजनीतिक फैसलों पर अक्सर सेना की ही आखिरी बात मानी जाती है और उसका निर्णायक प्रभाव होता है।"
लेखिका ने आगे कहा, "एक-दूसरे पर स्वतंत्र रूप से नज़र रखने के बजाय, कार्यपालिका और सैन्य प्रतिष्ठान तेज़ी से एक-दूसरे के साथ मिल गए हैं, जिससे सरकारी सत्ता का विस्तार हुआ है और न्यायिक व लोकतांत्रिक जवाबदेही कमज़ोर हुई है। देश में लोकतंत्र की कुछ विशेषताएं हैं, जैसे चुनाव और संसद, लेकिन एक बिना चुनी हुई ताकत, यानी सेना का काफ़ी नियंत्रण बना हुआ है। इसलिए पाकिस्तान असल में तानाशाही और लोकतंत्र के मिले-जुले शासन (हाइब्रिड शासन) के तौर पर काम करता है।"
कोर्ट की कार्यवाही के दौरान ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और उनके पति को उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार नहीं दिए गए। गिरफ़्तारी के समय पाकिस्तान पुलिस ने न तो गिरफ़्तारी वारंट दिखाया और न ही कोई फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) पेश की, जो कानून के अनुसार ज़रूरी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस जोड़े को किसी अज्ञात जगह पर भेज दिया, उन्हें एंटी-टेररिज्म कोर्ट की कार्यवाही के दौरान कोर्टरूम में जाने की इजाज़त नहीं दी गई और उन्हें कानूनी मदद भी नहीं दी गई।
उन्हें कोर्ट में वर्चुअली पेश किया गया; यह कार्यवाही एक मिनट से भी कम समय तक चली और अचानक खत्म हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इन उल्लंघनों के अलावा, हाई कोर्ट में ट्रांसफर की एक अर्जी भी पेंडिंग थी क्योंकि ट्रायल कोर्ट के पास अधिकार-क्षेत्र नहीं था, जिससे पूरी सज़ा की वैधता पर सवाल उठते हैं। कुल मिलाकर, इस मामले में प्रक्रिया से जुड़ी ये गड़बड़ियां पाकिस्तान की न्यायपालिका की निष्पक्षता और आज़ादी पर सवाल खड़े करती हैं।
इस महीने की शुरुआत में, प्रमुख मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को पत्र लिखकर ईमान मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा की लगातार "गैर-कानूनी" कैद पर गहरी चिंता जताई थी।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तानी पीएम से अपनी अपील में कहा, "ईमान मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा को मानवाधिकार वकीलों के तौर पर उनके काम और पाकिस्तान के अंदर कार्यकर्ताओं और आंदोलनों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने की सज़ा के तौर पर कैद किया जा रहा है। 'प्रिवेंशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट' के तहत उनकी कैद देश के अंदर असहमति की आवाज़ को दबाने के लिए कानून के गलत इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े करती है और यह पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार ज़िम्मेदारियों के खिलाफ है।"
ईमान की बिगड़ती सेहत और सही मेडिकल देखभाल न मिल पाने पर चिंता जताते हुए मानवाधिकार संगठन ने कहा, "ईमान के मसूड़ों से बहुत ज़्यादा खून बह रहा था, और जेल प्रशासन उन्हें डेंटिस्ट से नहीं दिखा पाया। ईमान मज़ारी हाज़िर के परिवार ने डेंटिस्ट से सलाह लेने के बाद उन्हें दवा भेजी; हालांकि, जेल प्रशासन ने उन्हें सारी दवा नहीं दी। उन्हें छाती में इन्फेक्शन और पेट की समस्या भी थी।"
मानवाधिकार संगठन ने पाकिस्तान सरकार से मांग की कि वह ईमान और हादी की सज़ा को रद्द करने और उन्हें तुरंत और बिना किसी शर्त के रिहा करने के लिए सभी ज़रूरी कदम उठाए।
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