अंतरिक्ष में बढ़ती सैटेलाइट की भीड़, टकराव और वैज्ञानिक शोध पर असर की चिंता
क्या अंतरिक्ष पर बढ़ रहा निजी कंपनियों का प्रभाव?
पृथ्वी की निचली कक्षा में तेजी से बढ़ती सैटेलाइट गतिविधियां अंतरिक्ष के सुरक्षित इस्तेमाल को लेकर नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। बड़े उपग्रह समूहों के विस्तार से संचार सुविधाओं की संभावनाएं बढ़ी हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के सामने टकराव, अंतरिक्ष मलबे और खगोलीय अवलोकन में बाधा जैसी चिंताएं भी हैं। इसी के साथ सवाल उठ रहा है कि अंतरिक्ष में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी का भविष्य में क्या प्रभाव पड़ेगा। वैज्ञानिक संस्थाओं की रिपोर्टें बेहतर निगरानी, जिम्मेदार संचालन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत रेखांकित करती हैं।
क्या अंतरिक्ष का निजीकरण हो रहा है?
निजी कंपनियों द्वारा उपग्रहों का संचालन बढ़ना और अंतरिक्ष पर मालिकाना अधिकार स्थापित होना अलग बातें हैं। वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुसार, कोई देश संप्रभुता का दावा करके, इस्तेमाल या कब्जे के आधार पर अंतरिक्ष को अपना क्षेत्र नहीं बना सकता। संधि अंतरिक्ष की खोज और उपयोग में सभी देशों के हितों तथा वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता को महत्व देती है। निजी संस्थाओं की गतिविधियां भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हैं। संधि के अनुच्छेद छह के तहत संबंधित देशों को गैर-सरकारी अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति और निरंतर निगरानी सुनिश्चित करनी होती है। इसलिए व्यावसायिक विस्तार के साथ सरकारी जवाबदेही भी जुड़ी है। बढ़ती भीड़ के संदर्भ में असली चुनौती साझा अंतरिक्ष वातावरण तक सुरक्षित पहुंच बनाए रखने की है।
निचली कक्षा में क्यों बढ़ रहा दबाव?
निचली पृथ्वी कक्षा सामान्यतः लगभग दो हजार किलोमीटर से नीचे की कक्षाओं को कहा जाता है। यहां उपग्रह अलग-अलग ऊंचाइयों और मार्गों पर घूमते हैं। उन्हें केवल संख्या से समझना पर्याप्त नहीं है; उनकी ऊंचाई, संचालन अवधि और दूसरे अंतरिक्ष पिंडों के साथ नजदीकी भी महत्वपूर्ण होती है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में 300 से अधिक प्रक्षेपण हुए और चार हजार से अधिक नए पेलोड कक्षा में पहुंचाए गए। बड़े उपग्रह समूहों और एक प्रक्षेपण से कई पेलोड भेजने की व्यवस्था के कारण अंतरिक्ष गतिविधियां बढ़ रही हैं। एजेंसी ने बेहतर निगरानी और अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन की जरूरत बताई है।
सक्रिय सैटेलाइट और मलबा दोनों चिंता
कक्षा में मौजूद प्रत्येक वस्तु काम कर रहा उपग्रह नहीं होती। निष्क्रिय उपग्रह, इस्तेमाल हो चुके रॉकेट के हिस्से और टूटने से बने टुकड़े भी घूमते रहते हैं। ईएसए की रिपोर्टों में सक्रिय उपग्रहों के साथ मलबे की मौजूदगी को सुरक्षित संचालन के लिए चुनौती बताया गया है। एजेंसी की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 550 किलोमीटर ऊंचाई वाले क्षेत्र में खतरा पैदा करने वाले मलबे की अनुमानित संख्या सक्रिय उपग्रहों की संख्या के तुलनीय स्तर पर पहुंच चुकी थी। इसका अर्थ हर उपग्रह के लिए तत्काल टकराव नहीं है, लेकिन निगरानी और बचाव की जरूरत बढ़ना है।
एक टक्कर से आगे बढ़ सकता है खतरा
दीर्घकालिक चिंता टकराव की ऐसी श्रृंखला है, जिसमें एक दुर्घटना से निकले टुकड़े आगे दूसरे पिंडों से टकराएं। इसे केसलर सिंड्रोम कहा जाता है। यह किसी एक निश्चित तारीख को होने वाली घटना की घोषणा नहीं, बल्कि कक्षीय वातावरण बिगड़ने का संभावित क्रम है। मलबा कम करने के प्रयासों के बावजूद उसका समग्र जमाव बढ़ रहा है। इसलिए मिशन समाप्त होने पर उपग्रहों का व्यवस्थित निपटान और पुराने मलबे को हटाने की तकनीक महत्वपूर्ण हैं।
दूरबीनों की तस्वीरों और रेडियो संकेतों पर असर
खगोलविदों की चिंता केवल टकराव तक सीमित नहीं है। सूर्य का प्रकाश परावर्तित करने वाले सैटेलाइट ऑप्टिकल दूरबीनों के अवलोकन में चमकीली रेखाएं छोड़ सकते हैं। उपग्रहों से होने वाला रेडियो उत्सर्जन रेडियो वेधशालाओं के काम को प्रभावित कर सकता है। इससे अंतरिक्ष के कमजोर और दूरस्थ संकेतों का अध्ययन कठिन हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ से जुड़े वैज्ञानिकों ने उपग्रह समूहों से होने वाले हस्तक्षेप को कम करने का आह्वान किया है। उनका जोर यह है कि संचार तकनीक के विस्तार के साथ वैज्ञानिक खोज के लिए जरूरी अंधेरे और रेडियो हस्तक्षेप से मुक्त आसमान की सुरक्षा भी हो।
समाधान के लिए तकनीक और समन्वय जरूरी
अंतरिक्ष गतिविधियों के सुरक्षित विस्तार के लिए उपग्रहों की स्थिति संबंधी जानकारी साझा करना, संभावित टकराव पहचानना और मिशन समाप्त होने पर निपटान की व्यवस्था जरूरी है। ईएसए ने निचली कक्षा में मिशन के बाद निपटान अवधि घटाने तथा कक्षा में मरम्मत और मलबा हटाने की तकनीकों पर काम का उल्लेख किया है। खगोलीय अनुसंधान पर बड़े उपग्रह समूहों के प्रभाव का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र की अंतरिक्ष संबंधी वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपसमिति की चर्चाओं में भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार, इस विषय पर 2029 तक सालाना चर्चा निर्धारित है। बढ़ती गतिविधियों के बीच वैज्ञानिक संस्थानों, सरकारों और संचालकों के बीच संवाद साझा कक्षीय वातावरण की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।