नेपाल : आई भीषण आपदा के बाद राहत और बचाव कार्यों के बीच **रैट-होल माइनर्स** एक बार फिर चर्चा में हैं। संकरी सुरंगों में जाकर मुश्किल परिस्थितियों में काम करने वाले इन विशेषज्ञों को कई बार ऐसे रेस्क्यू ऑपरेशन में लगाया जाता है, जहां बड़ी मशीनें काम नहीं कर पातीं। भारत में भी उत्तराखंड के सिलक्यारा सुरंग हादसे के दौरान रैट-होल माइनर्स ने फंसे मजदूरों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई थी।
नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन के बाद कई जगहों पर लोगों के फंसे होने की खबरें सामने आई हैं। भारत ने नेपाल को राहत और बचाव कार्यों में सहायता की पेशकश की है। ऐसे में विशेषज्ञों की मदद और विशेष बचाव तकनीकों की जरूरत बढ़ गई है।
क्या होती है रैट-होल माइनिंग?
रैट-होल माइनिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें इंसान बेहद संकरी सुरंगों में प्रवेश कर हाथों से खुदाई करता है। इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें बनाई जाने वाली सुरंगें चूहे के बिल जैसी छोटी और संकरी होती हैं।
इस तकनीक में एक व्यक्ति ही मुश्किल से अंदर जा पाता है। मजदूर छोटे औजारों की मदद से मिट्टी, पत्थर और मलबा हटाते हैं। आमतौर पर यह तरीका कोयला निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन आपदा के समय संकरी जगहों में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।
कैसे काम करते हैं रैट-होल माइनर्स?
रैट-होल माइनर्स का काम बेहद जोखिम भरा होता है। इनके काम करने का तरीका कुछ इस तरह होता है:
1. संकरी सुरंग बनाना
सबसे पहले ऐसी जगह तक पहुंचने के लिए छोटी सुरंग बनाई जाती है, जहां मशीनें नहीं पहुंच पातीं।
2. हाथों से मलबा हटाना
माइनर्स छोटे औजारों से मिट्टी, पत्थर और मलबा हटाते हैं। कई बार उन्हें एक-एक इंच जगह बनाकर आगे बढ़ना पड़ता है।
3. पाइप या रास्ता तैयार करना
रेस्क्यू ऑपरेशन में माइनर्स रास्ता साफ करने के बाद बड़े पाइप या निकासी मार्ग तैयार करने में मदद करते हैं, जिससे फंसे लोगों को बाहर निकाला जा सके।
क्यों पड़ती है रैट-होल माइनर्स की जरूरत?
बड़ी ड्रिलिंग मशीनें कई बार सुरंगों में काम नहीं कर पातीं। मशीन टूट सकती है, मलबे में फंस सकती है या जगह की कमी के कारण आगे नहीं बढ़ पाती।
ऐसे समय में इंसान की समझ और हाथ से काम करने की क्षमता ज्यादा प्रभावी साबित होती है। रैट-होल माइनर्स छोटी जगहों में पहुंचकर वह काम कर सकते हैं जो भारी मशीनें नहीं कर पातीं।
उत्तराखंड सुरंग हादसे में बने थे हीरो
भारत में रैट-होल माइनर्स सबसे ज्यादा चर्चा में तब आए जब उत्तराखंड के सिलक्यारा सुरंग हादसे में 41 मजदूर फंस गए थे।
जब ऑगर मशीन से ड्रिलिंग में परेशानी आई, तब रैट-होल माइनर्स को बुलाया गया। उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में हाथ से खुदाई कर फंसे मजदूरों तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया।
उनकी मेहनत के बाद देशभर में उनकी तारीफ हुई और उन्हें इस रेस्क्यू अभियान के असली नायकों में गिना गया।
कितना खतरनाक होता है यह काम?
रैट-होल माइनिंग बेहद जोखिम भरी प्रक्रिया है। इसमें कई तरह के खतरे होते हैं:
* सुरंग धंसने का खतरा
* ऑक्सीजन की कमी
* जहरीली गैसों का खतरा
* अचानक पानी भरने का खतरा
* कम रोशनी और कम जगह में काम करना
इसी वजह से इस तकनीक को लेकर लंबे समय से सुरक्षा संबंधी सवाल उठते रहे हैं।
भारत में रैट-होल माइनिंग पर विवाद क्यों हुआ?
भारत में खासकर मेघालय में रैट-होल माइनिंग का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता था। लेकिन सुरक्षा मानकों की कमी और हादसों के कारण इस पर प्रतिबंध लगाया गया।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस तरीके को खतरनाक बताते हुए रोक लगाई थी। हालांकि, आपातकालीन बचाव अभियानों में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मदद ली जाती रही है।
नेपाल रेस्क्यू में क्यों अहम हो सकते हैं?
नेपाल जैसे पहाड़ी देश में भूस्खलन, बाढ़ और सुरंगों से जुड़े हादसों में कई बार रास्ते बंद हो जाते हैं। ऐसे हालात में छोटी जगहों तक पहुंचने वाले विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती है।
रैट-होल माइनर्स:
* मलबे के बीच रास्ता बना सकते हैं
* कम जगहों में काम कर सकते हैं
* फंसे लोगों तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं
इसी कारण बड़े बचाव अभियानों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
रैट-होल माइनर्स और आधुनिक तकनीक का मेल
आज के समय में रेस्क्यू ऑपरेशन में केवल इंसानी मेहनत पर निर्भर नहीं रहा जाता। ड्रोन, कैमरे, सेंसर और भारी मशीनों के साथ रैट-होल माइनर्स की विशेषज्ञता मिलकर बेहतर परिणाम दे सकती है।
मशीन जहां रुक जाती है, वहां इंसानी अनुभव और साहस काम आता है।
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