उइगुरों के हालात पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने का दावा डोलकुन ईसा ने उठाई आवाज
जिनेवा। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें नियमित सत्र के दौरान उइगुर समुदाय के मानवाधिकारों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है। वर्ल्ड उइगुर कांग्रेस से जुड़े प्रमुख नेता डोलकुन ईसा ने चीन की शिनजियांग नीति पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि उइगुरों को लेकर बीजिंग की मूल नीति में कोई बदलाव नहीं आया है, हालांकि बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उसके तौर-तरीकों में बदलाव दिखाई दे रहा है।UNHRC का 63वां नियमित सत्र जिनेवा के पैलेस ऑफ नेशंस में 7 सितंबर से 7 अक्टूबर 2026 तक चल रहा है। इस सत्र में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों की स्थिति पर चर्चा की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने भी सत्र की शुरुआत में शिनजियांग की स्थिति पर चिंता दोहराई थी और चीन से मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों की जांच तथा संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों पर आगे की कार्रवाई करने का आग्रह किया था।
जिनेवा में बोलते हुए ईसा ने कहा कि उइगुरों को लेकर चीन की नीति में बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। उनका दावा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे की बढ़ती निगरानी और आलोचना के बाद चीन ने अपनी रणनीति और तरीकों को बदला है। ये डोलकुन ईसा के आरोप हैं और चीन इनसे असहमति जताता रहा है।ईसा ने अंतरराष्ट्रीय दबाव का उल्लेख करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की शिनजियांग पर रिपोर्ट और स्वतंत्र ‘उइगुर ट्रिब्यूनल’ के निष्कर्षों सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कार्रवाइयों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टिंग ने भी उइगुरों की स्थिति को वैश्विक स्तर पर चर्चा में बनाए रखा है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने 31 अगस्त 2022 को शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र की स्थिति पर अपना विस्तृत आकलन जारी किया था। रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर मनमानी हिरासत, धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर प्रतिबंध, निगरानी तथा यातना और दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच की गई थी। OHCHR ने कहा था कि उइगुर और अन्य मुख्य रूप से मुस्लिम समुदायों के सदस्यों की मनमानी और भेदभावपूर्ण हिरासत सहित सामने आई कुछ कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय अपराध, विशेष रूप से मानवता के खिलाफ अपराध, की श्रेणी में आ सकती हैं।संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न मानवाधिकार संस्थाएं इसके बाद भी शिनजियांग से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताती रही हैं। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समिति ने भी उइगुर, कजाख, किर्गिज, हुई और अन्य मुस्लिम समुदायों के अधिकारों पर लगाए गए कथित प्रतिबंधों को लेकर चिंता दर्ज की थी और चीन से मानवाधिकार उल्लंघनों को समाप्त करने तथा OHCHR की सिफारिशों पर अमल करने का आग्रह किया था।
मौजूदा 63वें UNHRC सत्र में भी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने शिनजियांग का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र की स्थिति, विशेष रूप से हिरासत केंद्रों को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने चीन से राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी कानूनों की समीक्षा, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा मजबूत करने और यातना सहित मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों की जांच करने का आग्रह किया।हालांकि चीन ने इन आलोचनाओं और आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। UNHRC के इसी सत्र में चीन के प्रतिनिधि ने कहा कि शिनजियांग और तिब्बत में आर्थिक समृद्धि और धार्मिक सद्भाव है। चीनी प्रतिनिधि ने मानवाधिकार के मुद्दों के राजनीतिकरण का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रीय एकता और घरेलू मामलों से जुड़े विषय चीन की संप्रभुता के दायरे में आते हैं और इनमें बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
इस तरह शिनजियांग को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं और चीन के बीच लंबे समय से गंभीर मतभेद बने हुए हैं। मानवाधिकार संगठनों और उइगुर कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चीन ने उइगुरों की धार्मिक स्वतंत्रता, भाषा और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करने वाली नीतियां लागू की हैं। चीन का कहना है कि शिनजियांग में उसकी नीतियां आतंकवाद और चरमपंथ से निपटने, सामाजिक स्थिरता बनाए रखने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए हैं।
डोलकुन ईसा ने अपने बयान में दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बावजूद उइगुर समुदाय के लिए वास्तविक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं आया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मुद्दे की निगरानी जारी रखने और चीन पर मानवाधिकार संबंधी प्रतिबद्धताओं का पालन करने के लिए दबाव बनाए रखने की अपील की।उइगुर ट्रिब्यूनल का भी ईसा ने उल्लेख किया। यह ब्रिटेन में गठित एक स्वतंत्र गैर-सरकारी ट्रिब्यूनल था, न कि संयुक्त राष्ट्र या किसी सरकार की अदालत। उसने 2021 में अपने निष्कर्ष जारी करते हुए चीन पर उइगुर समुदाय के खिलाफ गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे। चीन ने ट्रिब्यूनल और उसके निष्कर्षों को खारिज किया था। इसलिए इसके निष्कर्षों को किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र गैर-सरकारी जांच के निष्कर्ष के रूप में देखना जरूरी है।
उइगुर मुख्य रूप से तुर्किक भाषी मुस्लिम समुदाय है, जिसकी बड़ी आबादी चीन के शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र में रहती है। पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र में हिरासत, निगरानी, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और परिवारों के अलग होने जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बहस के केंद्र में रहे हैं।संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर यह मुद्दा समाप्त नहीं हुआ है। मौजूदा सत्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त की टिप्पणी से स्पष्ट है कि शिनजियांग की स्थिति अब भी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र की चिंताओं में शामिल है। दूसरी ओर चीन इन आरोपों को चुनौती देते हुए अपनी नीतियों को सुरक्षा, विकास और सामाजिक स्थिरता से जोड़ता है।
जिनेवा में डोलकुन ईसा की टिप्पणी इसी व्यापक विवाद का हिस्सा है। उनके मुताबिक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और विभिन्न देशों तथा संस्थाओं की प्रतिक्रियाओं ने उइगुर मुद्दे पर दबाव बढ़ाया है। चीन का पक्ष इससे अलग है और वह शिनजियांग से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताता रहा है। ऐसे में UNHRC का 63वां सत्र उइगुरों के मानवाधिकार और चीन की शिनजियांग नीति को लेकर जारी अंतरराष्ट्रीय बहस का एक और महत्वपूर्ण मंच बन गया है।