Claims of three storms :   सूर्य की गतिविधियों के कारण अगले कुछ दिनों में पृथ्वी के अंतरिक्ष मौसम में हलचल बढ़ने की संभावना है। तीन कोरोनल मास इजेक्शन यानी सीएमई के पृथ्वी की ओर बढ़ने संबंधी पूर्वानुमान सामने आए हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान केंद्र के नौ अक्टूबर को जारी बुलेटिन में नौ से ग्यारह अक्टूबर के दौरान अधिकतम जी2 स्तर की भूचुंबकीय गतिविधि का अनुमान दिया गया है। हालांकि, इससे तीन बड़े नुकसान होना या पूरी दुनिया का आसमान बदल जाना तय नहीं है। संभावित प्रभाव सौर उत्सर्जनों की दिशा, ताकत और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से उनकी प्रतिक्रिया पर निर्भर करेंगे। 
यहां जिस तूफान की बात हो रही है, वह अंतरिक्ष मौसम से जुड़ी घटना है। सीएमई सूर्य के बाहरी वातावरण से निकलने वाला प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र का बड़ा उत्सर्जन होता है। जब पृथ्वी की दिशा में आया उत्सर्जन उसके चुंबकीय क्षेत्र से संपर्क करता है, तो भूचुंबकीय तूफान उत्पन्न हो सकता है। इसे बारिश, तेज हवा या समुद्री चक्रवात के पूर्वानुमान की तरह नहीं समझना चाहिए। इसके प्रभाव मुख्य रूप से अंतरिक्ष में मौजूद उपकरणों, ऊपरी वायुमंडल और कुछ तकनीकी प्रणालियों से जुड़े होते हैं।
नौ अक्टूबर को जारी आधिकारिक तीन दिन के पूर्वानुमान में छह अक्टूबर के सौर उत्सर्जन के पहुंचने से जी1 से जी2 स्तर की हलचल होने की संभावना बताई गई है। जी1 को मामूली और जी2 को मध्यम स्तर का भूचुंबकीय तूफान कहा जाता है। बुलेटिन में नौ अक्टूबर के लिए सबसे ज्यादा गतिविधि का अनुमान है। ग्यारह अक्टूबर के कुछ समय में जी1 स्तर की संभावना भी दर्शाई गई है। यह पूर्वानुमान है, वास्तविक प्रभाव की पुष्टि लगातार प्राप्त होने वाले मापों से होगी। 
सौर उत्सर्जन के आने का समय निश्चित करना चुनौतीपूर्ण होता है। वैज्ञानिक उसकी गति, आकार और दिशा के आधार पर अनुमान तैयार करते हैं। तेज सीएमई पृथ्वी तक लगभग पंद्रह से अठारह घंटे में पहुंच सकता है, जबकि धीमे उत्सर्जन को कई दिन लग सकते हैं। पृथ्वी के पास पहुंचने पर उसके चुंबकीय क्षेत्र की दिशा विशेष महत्व रखती है। लंबे समय तक दक्षिण की ओर उन्मुख चुंबकीय क्षेत्र अधिक तीव्र भूचुंबकीय हलचल के अनुकूल होता है। इसलिए उत्सर्जनों की संख्या से अकेले नुकसान का स्तर तय नहीं किया जा सकता। 
संभावित असर का पहला क्षेत्र बिजली का बुनियादी ढांचा है। भूचुंबकीय हलचल के दौरान बदलता चुंबकीय क्षेत्र लंबी विद्युत लाइनों में अतिरिक्त धारा उत्पन्न कर सकता है। इससे कुछ परिस्थितियों में वोल्टेज नियंत्रण और उपकरणों के संचालन पर दबाव पड़ता है। प्रभाव स्थान, बिजली प्रणाली की बनावट और तूफान की तीव्रता के अनुसार अलग हो सकते हैं। इस वैज्ञानिक संभावना को आगामी घटना में हर जगह बिजली कटने की चेतावनी नहीं माना जा सकता। उपलब्ध पूर्वानुमान व्यापक बिजली संकट की निश्चित घोषणा नहीं करता।
दूसरा संभावित प्रभाव उपग्रहों के संचालन से संबंधित है। आधिकारिक जी2 श्रेणी के विवरण के मुताबिक, कुछ परिस्थितियों में उपग्रह की दिशा में सुधार करने की जरूरत पड़ सकती है। वायुमंडलीय घर्षण में बदलाव से उसकी कक्षा के पूर्वानुमान भी प्रभावित हो सकते हैं। अधिक तीव्र श्रेणी में उपग्रहों के कुछ हिस्सों पर
तीसरा क्षेत्र नेविगेशन और रेडियो संचार है। जीपीएस सिग्नल उपग्रह से जमीन पर मौजूद रिसीवर तक पहुंचते समय आयनमंडल से गुजरते हैं। अंतरिक्ष मौसम से आयनमंडल में बदलाव होने पर स्थिति की गणना में त्रुटियां बढ़ सकती हैं। तीव्र व्यवधान में रिसीवर को उपग्रह सिग्नल पकड़ने में परेशानी भी हो सकती है। प्रभाव प्रायः ऊंचे अक्षांशों पर महत्वपूर्ण होते हैं, हालांकि बड़े तूफान अन्य क्षेत्रों तक असर डाल सकते हैं। इसलिए संभावित जीपीएस समस्या को सभी मोबाइल फोन या सभी इंटरनेट सेवाएं बंद होने के दावे में बदलना उचित नहीं होगा। 
भूचुंबकीय तूफानों का एक दिखाई देने वाला प्रभाव ध्रुवीय प्रकाश यानी ऑरोरा है। जी1 स्तर पर यह सामान्यतः ऊंचे अक्षांशों में नजर आता है। जी2 स्तर की घटनाओं में कभी-कभी इसकी दृश्यता अपेक्षाकृत दक्षिण तक पहुंच सकती है। लेकिन इससे भारत के हर शहर में रंगीन रोशनी दिखाई देने का निष्कर्ष नहीं निकलता। वर्तमान आधिकारिक श्रेणी और उसके सामान्य प्रभावों के आधार पर किसी विशेष भारतीय स्थान के आसमान का रंग बदलने की गारंटी देना संभव नहीं है।
अंतरिक्ष मौसम की निगरानी में उपग्रहों और कंप्यूटर मॉडल की भूमिका महत्वपूर्ण है। पूर्वानुमान केंद्र सौर हवा तथा पृथ्वी की ओर आने वाले उत्सर्जनों का आकलन करने के लिए भौतिकी आधारित मॉडल इस्तेमाल करता है। इससे लगभग एक से चार दिन पहले संभावित गतिविधि की जानकारी मिल सकती है। सूर्य के उत्सर्जन की पहचान के बाद उसकी दिशा और गति मॉडल में शामिल की जाती है। ऐसे अनुमान बिजली, उपग्रह और संचार प्रणालियों के संचालकों को संभावित बदलावों की तैयारी में मदद करते हैं। 
फिलहाल ध्यान नौ से ग्यारह अक्टूबर की भूचुंबकीय गतिविधि पर है। तीन सौर उत्सर्जनों की चर्चा और आधिकारिक जी2 पूर्वानुमान के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। बिजली, उपग्रह और नेविगेशन संभावित रूप से प्रभावित होने वाले क्षेत्र हैं, लेकिन इन तीनों में भारी नुकसान तय नहीं है। भारत में व्यापक बिजली कटौती, इंटरनेट ठप होने या हर जगह आसमान बदलने का दावा उपलब्ध बुलेटिन से पुष्ट नहीं होता। आगे की स्थिति उत्सर्जनों के वास्तविक आगमन और नए मापों से स्पष्ट होगी।