नई दिल्ली New Delhi। नेपाल में अगस्त 2026 में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को हिला दिया। 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास भोटेकोशी नदी क्षेत्र में ग्लेशियर और पहाड़ी ढलान के टूटने से अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। इस आपदा में मौतों और लापता लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ता रहा। नेपाल के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित आपदा रिकॉर्ड में सितंबर के दौरान मृतकों की संख्या 1,400 से अधिक और लापता लोगों की संख्या 5,000 से अधिक दर्ज की गई।
अब इस त्रासदी के बाद नेपाल हिमालय में मौजूद कुछ बेहद संवेदनशील ग्लेशियल झीलों को लेकर बड़ा कदम उठाने जा रहा है। सरकार चार खतरनाक ग्लेशियल झीलों का जलस्तर नियंत्रित तरीके से कम करने की योजना पर काम कर रही है। इन झीलों में थुलागी, लोअर बरुन, लुमडिंग त्शो और होंगू II शामिल हैं। इन झीलों की ऊंचाई करीब 4,050 मीटर से 5,483 मीटर के बीच है और इन्हें नेपाल की सबसे अधिक जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों में गिना जाता है।
415 करोड़ रुपये की परियोजना से होगा जोखिम कम करने का प्रयास
इस पूरे मिशन पर करीब 5 करोड़ डॉलर यानी लगभग 415 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। परियोजना को ग्रीन क्लाइमेट फंड, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और नेपाल सरकार के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। योजना का मकसद इन झीलों में जमा पानी को नियंत्रित तरीके से कम करना है, ताकि प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा कम किया जा सके।
इस काम के लिए ऊंचाई वाले बेहद दुर्गम इलाकों में इंजीनियरिंग ढांचे तैयार किए जाएंगे। पानी की निकासी को नियंत्रित करने के लिए ड्रेनेज संरचनाएं बनाई जाएंगी। साथ ही झीलों पर सेंसर लगाए जाने और बाढ़ की पूर्व चेतावनी देने वाली व्यवस्था विकसित करने की योजना है। परियोजना में स्थानीय समुदायों की आपदा से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा।
क्यों खतरनाक हैं ये ग्लेशियल झीलें?
ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों में कई जगह झीलों का आकार और पानी की मात्रा बढ़ रही है। इन झीलों को अक्सर बर्फ, चट्टान और मलबे से बने प्राकृतिक बांध रोककर रखते हैं। यदि यह प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाए तो पानी, बर्फ, चट्टान और मलबे की तेज धारा नीचे की ओर तबाही मचा सकती है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।
नेपाल में ग्लेशियल झीलों का खतरा नया नहीं है। UNDP के मुताबिक देश में 1970 के दशक के बाद से 26 GLOF घटनाएं दर्ज की गई हैं और 47 ग्लेशियल झीलों को संभावित रूप से खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। चार झीलों को तत्काल प्राथमिकता वाले जोखिम क्षेत्रों के तौर पर चिन्हित किया गया है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में भी इन चार झीलों के आकार में बदलाव दर्ज किया गया है। 1992 से 2024 के बीच लोअर बरुन झील का क्षेत्रफल करीब 258 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान एक अध्ययन में सामने आया है। शोधकर्ताओं ने चारों झीलों में पानी के भंडारण में बड़े इजाफे की ओर भी ध्यान दिलाया है।
भारत के लिए क्यों अहम है नेपाल का मिशन?
नेपाल की यह परियोजना सीधे भारत की किसी एक नदी या इलाके को सुरक्षित करने की परियोजना नहीं है। फिर भी हिमालयी नदियों और आपदा जोखिमों की सीमा देशों से आगे जाती है। इसलिए नेपाल में बेहतर निगरानी और पूर्व चेतावनी व्यवस्था का क्षेत्रीय महत्व हो सकता है।
1. सीमा पार बाढ़ के जोखिम को समझने में मदद
नेपाल और भारत के बीच कई नदियों का जल तंत्र जुड़ा हुआ है। हिमालय में होने वाली बड़ी घटनाओं का असर नीचे की ओर नदी घाटियों तक पहुंच सकता है। ऐसे में नेपाल में सेंसर और पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत होने से भविष्य में संभावित बाढ़ के खतरे को समझने और तैयारी करने में मदद मिल सकती है।
2. भारत को भी मिलेगी आपदा प्रबंधन की सीख
नेपाल जिन तकनीकों का इस्तेमाल चार झीलों की निगरानी और जलस्तर नियंत्रित करने में करेगा, उनसे पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए सीख मिल सकती है। भारत भी ग्लेशियल झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रहा है। उत्तराखंड में भी ग्लेशियल झीलों के लिए शुरुआती चेतावनी व्यवस्था विकसित की जा रही है।
3. हिमालयी क्षेत्र में डेटा और सहयोग का महत्व बढ़ेगा
ग्लेशियल झीलों का खतरा किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है। हालिया वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि नेपाल-चीन सीमा से जुड़े ट्रांसबाउंड्री क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों में बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में निगरानी, जोखिम आकलन और शुरुआती चेतावनी से जुड़ी जानकारी का क्षेत्रीय आदान-प्रदान भारत सहित हिमालयी देशों के लिए उपयोगी हो सकता है।
सिर्फ झील खाली करना पर्याप्त नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल चार झीलों का जलस्तर कम कर देने से हिमालयी आपदाओं का पूरा खतरा खत्म नहीं होगा। जोखिम आकलन, लगातार निगरानी, शुरुआती चेतावनी, सुरक्षित निर्माण और नदी घाटियों की बेहतर योजना भी जरूरी है। काठमांडू पोस्ट में प्रकाशित विशेषज्ञों की राय में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि चार झीलों पर काम के साथ व्यापक जोखिम प्रबंधन की जरूरत रहेगी।
नेपाल की प्रस्तावित परियोजना कई वर्षों तक चल सकती है। इसका उद्देश्य केवल मौजूदा खतरे को कम करना नहीं, बल्कि हिमालयी समुदायों को भविष्य की ग्लेशियल बाढ़ से बेहतर तरीके से तैयार करना भी है। अगस्त की त्रासदी ने जिस खतरे को दुनिया के सामने ला दिया है, उसके बाद यह मिशन नेपाल के लिए आपदा से पहले तैयारी करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
Tags: