धर्म डेस्क : दिवाली पर दीपक जलाने, रंगोली बनाने और लक्ष्मी-गणेश की पूजा के साथ कई क्षेत्रीय परंपराएँ भी निभाई जाती हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनेक परिवारों में इस अवसर पर घरौंदा बनाने का विशेष चलन है। मिट्टी से तैयार छोटे घर को रंगों, फूलों और दीयों से सजाया जाता है। इसके भीतर छोटे बर्तन रखकर उनमें खील, बताशे, अनाज या मिठाइयाँ भरी जाती हैं। देखने में खिलौने जैसा लगने वाला यह घरौंदा लोकमान्यता में सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और भरे-पूरे घर का प्रतीक माना जाता है।

घरौंदा शब्द का संबंध घर से है। यह वास्तविक मकान का छोटा और कल्पनाशील रूप होता है। कहीं इसमें आँगन, दरवाजे और खिड़कियाँ बनाई जाती हैं, तो कहीं बच्चे इसे कई मंजिलों वाला रूप देते हैं। बनाने वाले अपनी पसंद के अनुसार इसका आकार और सजावट तय करते हैं। गोपालगंज से प्रकाशित एक स्थानीय रिपोर्ट में मिट्टी के अलावा लकड़ी और गत्ते से भी घरौंदा बनाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह इसकी बनावट में बदलाव के बावजूद छोटे घर को सजाने की मूल भावना बनी रहती है।
इस परंपरा से जुड़ी एक लोकप्रिय लोकमान्यता भगवान राम की अयोध्या वापसी से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके राम के लौटने पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। उनके आगमन को नगरी के फिर से बसने और खुशहाली लौटने से जोड़ा गया। घरौंदे को सजाने की परंपरा की व्याख्या भी इसी भावना के साथ की जाती है। हालांकि, यह लोकप्रचलित धार्मिक कथा है; घरौंदा बनाने की शुरुआत की निश्चित ऐतिहासिक तारीख या एकमात्र उत्पत्ति के रूप में इसे स्थापित नहीं किया जा सकता।
दिवाली की रात घरौंदे को रोशन करना परिवार में उजाला और समृद्धि बने रहने की कामना से जुड़ा है। कई परिवार लक्ष्मी-गणेश की पूजा के साथ घरौंदे के पास भी दीप जलाते हैं। लोकविश्वास में इसे देवी-देवताओं के स्वागत के लिए तैयार किए गए छोटे घर के रूप में देखा जाता है। अनाज और मिठाइयाँ रखने के पीछे घर के भंडार भरे रहने की भावना बताई जाती है। यह धार्मिक आस्था और प्रतीकात्मक परंपरा है, जिसे परिवार अपनी मान्यताओं के अनुसार निभाते हैं।
घरौंदे की सजावट में कुल्हिया-चुकिया का खास स्थान है। ये मिट्टी के छोटे बर्तन होते हैं, जिनसे गृहस्थी का लघु रूप तैयार किया जाता है। इनमें लावा, फरही, खील, बताशे और मिठाइयाँ रखने का चलन मिलता है। सामग्री के नाम और इस्तेमाल क्षेत्र के अनुसार बदल सकते हैं। कुछ परिवारों में पूजा के बाद इनमें रखी चीजें भाइयों को देने की परंपरा है। इसे भाई-बहन के स्नेह और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है। सभी घरों में यह रस्म एक ही तरीके से नहीं निभाई जाती।
भोजपुरी क्षेत्र में घरौंदा बनाने में विशेष रूप से बच्चियों और अविवाहित लड़कियों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका में प्रकाशित भोजपुरी लोकपरंपराओं संबंधी अध्ययन में भी इस प्रथा का वर्णन है। अध्ययन के अनुसार, दिवाली से पहले मिट्टी के घरौंदे और गृहस्थी से जुड़ी छोटी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। इसे सृजनात्मकता और घर-संसार की समझ से जोड़ा गया है। यह परंपरागत सामाजिक व्याख्या है; आज घर सजाने और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ सीखने में सभी बच्चों की भागीदारी हो सकती है।
घरौंदा तैयार करना बच्चों के लिए त्योहार से पहले की रोचक गतिविधि भी बन जाता है। भागलपुर के कहलगाँव क्षेत्र की एक स्थानीय रिपोर्ट में बच्चियों के दिवाली से कई दिन पहले तैयारी शुरू करने का वर्णन मिलता है। वे मिट्टी तैयार करने, छोटी दीवारें बनाने और रंग-रोगन करने में हिस्सा लेती हैं। बड़े सदस्य जरूरत पड़ने पर मदद करते हैं। दिवाली की रात घरौंदे के पास दीप जलाकर पूजा की जाती है। कुछ परिवारों में बच्चे बड़ों को मिठाई देते हैं और बदले में उपहार पाते हैं।
इस प्रक्रिया का सांस्कृतिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। बच्चे अपने आसपास देखे घरों को छोटे रूप में बनाने की कोशिश करते हैं और रंगों से अपनी कल्पना व्यक्त करते हैं। मिलकर काम करने से त्योहार की तैयारी साझा अनुभव बनती है। मिट्टी के बर्तन और खिलौने स्थानीय कारीगरी से भी जुड़े होते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली की दिवाली संबंधी रिपोर्ट में घरौंदे के साथ कुल्हिया, चुकिया और मिट्टी के खिलौने सजाने का उल्लेख मिलता है। इससे इसकी क्षेत्रीय विविधता और लोकजीवन से जुड़ाव दिखाई देता है।
बदलते समय में कुछ परिवार तैयार घरौंदे खरीदते हैं, जबकि कुछ अब भी बच्चों के साथ इन्हें बनाना पसंद करते हैं। सजावट की सामग्री बदल सकती है, लेकिन परिवार की खुशहाली की कामना इस परंपरा का केंद्रीय भाव बनी रहती है। इसे निभाने के लिए पूरे क्षेत्र में एक जैसी विधि अनिवार्य नहीं है। स्थानीय रीति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसके रूप अलग हैं। घरौंदे की विशेषता इसी में है कि मिट्टी का एक छोटा घर आस्था, बचपन की कल्पना, पारिवारिक मेलजोल और लोकसंस्कृति की यादों को एक साथ संजोता है।

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