Jitiya Vrat 2026: हिंदू धर्म में महिलाएं परिवार और संतान की सुख-समृद्धि के लिए कई तरह के व्रत रखती हैं। करवा चौथ और हरितालिका तीज इनमें प्रमुख हैं, लेकिन बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में मनाए जाने वाले जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत को विशेष रूप से कठिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना करते हुए यह व्रत रखती हैं।
जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व तीन चरणों में पूरा होता है। इसकी शुरुआत सप्तमी तिथि को नहाय-खाय से होती है। इसके बाद अष्टमी पर निर्जला उपवास रखा जाता है और नवमी तिथि में निर्धारित समय पर पारण किया जाता है।
क्यों कठिन माना जाता है जितिया व्रत?
जितिया की सबसे बड़ी विशेषता इसका कठोर निर्जला उपवास है। परंपरा के अनुसार व्रती महिलाएं व्रत की अवधि में अन्न के साथ पानी भी ग्रहण नहीं करती हैं। व्रत का समय तिथि के अनुसार लंबा हो सकता है। इस दौरान महिलाएं पूजा-अर्चना करती हैं और भगवान जीमूतवाहन से अपनी संतान की रक्षा तथा लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं।
करवा चौथ में भी कई महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला रहती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। वहीं जितिया का पारण चंद्रमा निकलने के आधार पर नहीं, बल्कि नवमी तिथि और स्थानीय पंचांग में बताए गए समय के अनुसार किया जाता है। इस कारण कई बार निर्जला उपवास की अवधि लंबी हो जाती है।
हरितालिका तीज से क्या है अंतर?
हरितालिका तीज का व्रत मुख्य रूप से अखंड सौभाग्य और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से जुड़ा माना जाता है। इसमें भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। कई परंपराओं में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं जितिया का व्रत विशेष रूप से संतान के कल्याण और दीर्घायु की कामना से जुड़ा है।
जितिया में व्रत शुरू होने से पहले नहाय-खाय की परंपरा भी होती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस दिन भोजन से जुड़े रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं। कई जगह नोनी का साग खाने की परंपरा है, जबकि कुछ समुदायों में मछली खाने की लोक परंपरा भी मिलती है।
जीमूतवाहन की कथा से जुड़ा है व्रत
जितिया व्रत के दौरान राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने की परंपरा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने एक नाग पुत्र की जान बचाने के लिए स्वयं को पक्षीराज गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया था।
जीमूतवाहन के त्याग और साहस से प्रभावित होकर गरुड़ ने उन्हें जीवनदान दिया और नागों को अपना भोजन न बनाने का वचन दिया। इसी कथा को संतान की रक्षा और जीवन से जोड़कर देखा जाता है। जितिया पूजा के दौरान महिलाएं कथा सुनकर अपने बच्चों की लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं।
पारण के नियम का विशेष महत्व
जितिया में पारण को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। महिलाएं नवमी तिथि में निर्धारित शुभ समय के बाद ही भोजन और पानी ग्रहण करके व्रत पूरा करती हैं। यही कारण है कि इसे अनुशासन और संयम से जुड़ा कठिन व्रत माना जाता है।
हालांकि करवा चौथ, हरितालिका तीज और जितिया तीनों के नियम क्षेत्र, समुदाय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक व्रत को हर परंपरा में निश्चित रूप से दूसरे से कठिन कहना उचित नहीं है। जितिया को खास तौर पर उसके लंबे निर्जला उपवास और संतान की दीर्घायु से जुड़ी लोक आस्था के कारण कठिन व्रत के रूप में जाना जाता है।