Chhath Puja: भारतीय संस्कृति में छठ महापर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। सूर्य देव और छठी मइया की उपासना का यह पर्व आस्था, तपस्या, पवित्रता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। आमतौर पर लोग दीपावली के बाद कार्तिक महीने में मनाए जाने वाले छठ पर्व से परिचित हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि छठ पूजा वर्ष में दो बार की जाती है। एक बार चैत्र महीने में और दूसरी बार कार्तिक महीने में। चैत्र में मनाए जाने वाले इस पर्व को चैती छठ, जबकि कार्तिक में आयोजित होने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। दोनों अवसरों पर सूर्य देव और छठी मइया की आराधना की जाती है।
छठ महापर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोकसंस्कृति से जुड़ा हुआ है। हालांकि, अब देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों में बसे श्रद्धालु भी इसे पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं। इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अस्त होते सूर्य और उगते सूर्य, दोनों को अर्घ्य दिया जाता है। यह परंपरा जीवन में सुख-दुख, उत्थान-पतन और प्रकृति के हर स्वरूप के प्रति सम्मान का संदेश देती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छठी मइया की पूजा संतान की सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। श्रद्धालु कठिन नियमों का पालन करते हुए व्रत रखते हैं। खास बात यह है कि इस महापर्व में भव्य मंदिरों या बड़े धार्मिक आयोजनों की अनिवार्यता नहीं होती। नदी, तालाब और अन्य स्वच्छ जलस्रोतों के किनारे श्रद्धालु सामूहिक रूप से सूर्य देव की आराधना करते हैं।
चैत्र और कार्तिक छठ में क्या है अंतर?
चैती छठ चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। यह समय वसंत ऋतु का होता है। वहीं, कार्तिकी छठ दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष में आयोजित होती है। दोनों पर्वों की पूजा-पद्धति लगभग समान होती है। इनमें नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य का विशेष महत्व है। कार्तिक छठ का आयोजन अधिक व्यापक स्तर पर दिखाई देता है, जबकि चैती छठ भी श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, दोनों ही अवसरों पर सूर्य देव और छठी मइया की उपासना का समान महत्व माना जाता है।
पहला दिन: नहाय-खाय से होती है महापर्व की शुरुआत
छठ पूजा के पहले दिन को नहाय-खाय कहा जाता है। इस दिन व्रती स्नान करके स्वयं को शुद्ध करते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। परंपरा के अनुसार, घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है। भोजन में लौकी की सब्जी, चने की दाल और चावल का विशेष महत्व होता है। नहाय-खाय केवल भोजन से जुड़ी परंपरा नहीं है, बल्कि इसे तन और मन की पवित्रता के संकल्प के रूप में देखा जाता है। इस दिन से पूरे परिवार में छठ पूजा की तैयारियां तेज हो जाती हैं।
दूसरा दिन: खरना के बाद शुरू होती है कठिन तपस्या
छठ महापर्व का दूसरा दिन खरना कहलाता है। इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और शाम को पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। खरना के प्रसाद में गुड़ की खीर और रोटी बनाने की परंपरा है।खरना संपन्न होने के बाद व्रती आमतौर पर लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं। यह व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है, क्योंकि इस दौरान भोजन और पानी का त्याग किया जाता है। श्रद्धालु इसे छठी मइया के प्रति अपनी अटूट आस्था और समर्पण का प्रतीक मानते हैं।
तीसरा दिन: डूबते सूर्य को दिया जाता है संध्या अर्घ्य
तीसरा दिन छठ महापर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन व्रती परिवार के सदस्यों के साथ नदी या तालाब के घाटों पर पहुंचते हैं। बांस के सूप और डलिया में फल, ठेकुआ, नारियल, गन्ना और अन्य पारंपरिक प्रसाद सजाए जाते हैं। सूर्यास्त के समय श्रद्धालु जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस दौरान घाटों पर छठी मइया के पारंपरिक गीत गूंजते हैं। पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर हो जाता है। छठ पूजा की यह विशेषता भारतीय धार्मिक परंपराओं में अलग पहचान रखती है। इसमें डूबते हुए सूर्य को भी उसी श्रद्धा से प्रणाम किया जाता है, जिस श्रद्धा से उगते सूर्य की पूजा की जाती है।
चौथा दिन: उगते सूर्य को अर्घ्य देकर होता है व्रत का समापन
छठ महापर्व के चौथे और अंतिम दिन श्रद्धालु सूर्योदय से पहले घाटों पर पहुंचते हैं। व्रती जल में खड़े होकर उगते सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं। सूर्य की पहली किरण दिखाई देने के साथ ही अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद छठी मइया से परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु और सभी के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है। उषा अर्घ्य संपन्न होने के बाद व्रती पारण करके अपना उपवास समाप्त करते हैं। इसी के साथ चार दिवसीय छठ महापर्व का समापन हो जाता है।
छठ पूजा का धार्मिक और सामाजिक महत्व
छठ महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और सामाजिक एकता का भी संदेश देता है। इस पर्व में जल, सूर्य, मिट्टी, फल और प्राकृतिक वस्तुओं का विशेष महत्व होता है। प्रसाद तैयार करने से लेकर पूजा सामग्री सजाने तक स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस पर्व की एक खूबसूरत विशेषता सामूहिक सहभागिता है। परिवार और पड़ोस के लोग मिलकर घाटों की सफाई करते हैं, पूजा की तैयारियां करते हैं और एक-दूसरे की सहायता करते हैं। छठ पर्व में महिलाओं के साथ पुरुष भी व्रत रखते हैं। पूजा में दिखावे से अधिक श्रद्धा, अनुशासन और समर्पण को महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि छठ को लोकआस्था का महापर्व कहा जाता है।
2026 में कब है कार्तिक छठ?
वर्ष 2026 में कार्तिक छठ महापर्व 13 नवंबर से शुरू होकर 16 नवंबर तक चलेगा। 13 नवंबर को नहाय-खाय, 14 नवंबर को खरना, 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य के साथ पर्व का समापन होगा। इस प्रकार छठ महापर्व का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति समर्पण और जीवन में अनुशासन का महत्व भी समझाता है। चाहे चैत्र की छठ हो या कार्तिक की, श्रद्धालुओं के लिए छठी मइया की महिमा और सूर्य देव के प्रति आस्था सदैव एक समान रहती है।
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