Religion Spirituality,धर्म अध्यात्म: हिंदू पंचांग में अधिक मास का विशेष महत्व बताया गया है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और इसका संबंध सीधे भगवान विष्णु से माना जाता है। हर कुछ वर्षों में जब चंद्र मास और सौर वर्ष के बीच तालमेल बैठाने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, तब अधिक मास आता है। आम भाषा में इसे मलमास भी कहा जाता है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से यह महीना अशुभ नहीं, बल्कि बेहद पवित्र माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इसी कारण इसे भगवान विष्णु का पुरुषोत्तम मास कहा गया।
पंचांग के अनुसार, एक चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का होता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग हर 32 महीने, 16 दिन और 8 घंटे में एक अधिक मास जोड़ा जाता है। जब किसी चंद्र महीने में सूर्य का संक्रांति परिवर्तन नहीं होता, तब उस महीने को अधिक मास कहा जाता है। यही व्यवस्था हिंदू कैलेंडर को ऋतुओं के अनुरूप बनाए रखने के लिए की गई है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, अधिक मास को लेकर पहले देवताओं और मानव समाज में भ्रम की स्थिति थी। कहा जाता है कि इस महीने में कोई भी बड़ा यज्ञ, विवाह या शुभ संस्कार नहीं किए जाते थे, जिससे इसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। इसी कारण इस मास ने स्वयं भगवान विष्णु की शरण ली और अपनी व्यथा सुनाई। तब भगवान विष्णु ने इसे अपने नाम से जोड़ते हुए इसे पुरुषोत्तम मास का दर्जा दिया।
शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने कहा कि जिस प्रकार वे स्वयं पुरुषोत्तम हैं, उसी तरह यह मास भी पुरुषोत्तम कहलाएगा। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि इस महीने में की गई भक्ति, जप, तप और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलेगा। तभी से अधिक मास को भगवान विष्णु को समर्पित माना जाने लगा।
पुरुषोत्तम मास में विशेष रूप से विष्णु पूजा, श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, विष्णु सहस्रनाम का जाप और व्रत का महत्व बताया गया है। इस दौरान भक्तजन उपवास रखते हैं और संयमित जीवन जीने का प्रयास करते हैं। माना जाता है कि इस महीने में की गई साधना से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और मन को शांति मिलती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस मास में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। अन्न, वस्त्र, फल और जल का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही जरूरतमंदों की सेवा को भी पुरुषोत्तम मास में श्रेष्ठ कर्म माना गया है। हालांकि विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य इस अवधि में वर्जित माने जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का समय माना गया है। इस दौरान व्यक्ति को अपने आचरण, विचार और कर्मों पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है। यह समय भौतिक इच्छाओं से दूरी बनाकर ईश्वर भक्ति में मन लगाने के लिए उपयुक्त माना गया है।
कुल मिलाकर, अधिक मास को भगवान विष्णु का पुरुषोत्तम मास कहे जाने के पीछे गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक कारण छिपा है। यह महीना नकारात्मक नहीं, बल्कि भक्ति, संयम और पुण्य कमाने का विशेष अवसर माना जाता है। इसी वजह से शास्त्रों में इसे अत्यंत पवित्र और फलदायी मास बताया गया है।
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