धनतेरस 2026 पर पुराने सिक्के और नए दीपक क्यों हैं खास जानें इनसे जुड़ी मान्यताएं
धर्म डेस्क: धनतेरस का नाम आते ही सोना-चांदी, बर्तन और नई वस्तुओं की खरीदारी का विचार मन में आता है। बाजारों की चमक के बीच इस पर्व से जुड़ी कुछ घरेलू परंपराएं भी विशेष महत्व रखती हैं। इनमें पहले से घर में रखे सिक्कों की पूजा और मिट्टी के दीपक जलाना शामिल है। कुछ परिवार पुराने और नए सिक्कों को साथ रखकर पूजन करते हैं, जबकि शाम को यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है। इन परंपराओं को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि इनके अर्थ धार्मिक आस्था और पारिवारिक रीति से जुड़े हैं।
वर्ष 2026 में धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर को मनाई जाएगी। इसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। इसी दिन यम दीपदान की परंपरा भी निभाई जाएगी। दृक पंचांग ने नई दिल्ली के लिए यम दीपम की तिथि 6 नवंबर बताई है। पूजा का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है, इसलिए किसी दूसरे शहर का मुहूर्त अपने यहां लागू करने के बजाय स्थानीय पंचांग देखना उचित रहेगा।
पुराने सिक्कों का महत्व समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यहां ‘पुराने’ से आशय कई परिवारों में पिछली धनतेरसों पर खरीदे गए पूजा के सिक्कों से होता है। जरूरी नहीं कि ये ऐतिहासिक या दुर्लभ सिक्के हों। प्रचलित पूजा-विधियों में नए सिक्कों के साथ घर में पहले से मौजूद पूजा के सिक्कों को भी शामिल करने का उल्लेख मिलता है। हालांकि, उपलब्ध संदर्भ में यह विधि दीपावली की लक्ष्मी पूजा से जुड़ी है। इसलिए इसे धनतेरस पर सभी लोगों के लिए अनिवार्य नियम बताना सही नहीं होगा।
इस परंपरा की एक सांस्कृतिक व्याख्या यह है कि नई संपत्ति के स्वागत के साथ पहले से मौजूद साधनों के प्रति भी सम्मान व्यक्त किया जाए। पूजा में रखा पुराना सिक्का परिवार की निरंतरता और संजोकर रखने की भावना का प्रतीक बन सकता है। यह अर्थ प्रतीकात्मक है। किसी सिक्के की उम्र, धातु या उसे तिजोरी में रखने से धन बढ़ने की गारंटी नहीं मिलती। इसी तरह पूजा के लिए महंगा या दुर्लभ सिक्का खरीदना आवश्यक मानने का भी आधार नहीं है। परिवार में जो रीति प्रचलित हो, उसके अनुसार उपलब्ध सामग्री से पूजा की जा सकती है।
नए दीपकों का संबंध दीपोत्सव की तैयारी और प्रकाश की परंपरा से है। धनतेरस पर मिट्टी के दीये खरीदने की प्रथा का उल्लेख धार्मिक मार्गदर्शिकाओं में मिलता है। इन्हें धनतेरस तथा दीपावली के अवसर पर जलाया जाता है। दीपक को आशा और शुभ शुरुआत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हालांकि, नया दीपक खरीदने की परंपरा को ऐसा कठोर नियम नहीं समझना चाहिए कि साफ और उपयोग योग्य पुराने पूजा-दीपक रखने से कोई अनिष्ट होगा। अलग-अलग घरों में इस्तेमाल होने वाले दीपक और पूजा की सामग्री भिन्न हो सकती है।
धनतेरस की शाम यमराज के नाम से दीपक जलाने को यम दीपदान या यम दीपम कहा जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, घर के मुख्य द्वार के पास दक्षिण दिशा में दीपक रखकर परिवार की रक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। धार्मिक विश्वास में इसका संबंध अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति की कामना से है। इसे स्वास्थ्य या जीवन की सुरक्षा का सुनिश्चित उपाय नहीं माना जाना चाहिए। यह श्रद्धा से किया जाने वाला धार्मिक अनुष्ठान है, जिसकी विधि में क्षेत्र और परिवार के अनुसार अंतर हो सकता है। इससे जुड़ी एक प्रचलित लोककथा राजा हेम के पुत्र की है। कथा में विवाह के कुछ समय बाद राजकुमार की मृत्यु का प्रसंग और उसकी पत्नी के दुख का वर्णन मिलता है। यमराज के निमित्त दीपदान को इस कथा से जोड़कर समझाया जाता है। इसके अलग-अलग संस्करण सुनाए जाते हैं। इन कथाओं का उद्देश्य परिवार के प्रति स्नेह, जीवन के महत्व और मंगलकामना की भावना व्यक्त करना है। इन्हें ऐतिहासिक घटना के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की आराधना का भी महत्व है। पर्व में स्वास्थ्य और समृद्धि, दोनों की कामना जुड़ी हुई है। लक्ष्मी और कुबेर पूजन के साथ धन्वंतरि का स्मरण इस अवसर को खरीदारी से व्यापक अर्थ देता है। घर की सफाई, पूजा की तैयारी और दीपों की व्यवस्था परिवार को उत्सव से जोड़ती है। बर्तन या सिक्का खरीदने की परंपरा निभाते समय अपनी जरूरत और क्षमता के अनुसार चुनाव किया जा सकता है। पूजा की भावना को खरीदारी की रकम से मापना जरूरी नहीं है। दीपक जलाते समय उसे स्थिर और सुरक्षित स्थान पर रखें। पर्दे, कागज और सजावटी सामग्री लौ से दूर हों तथा बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच का ध्यान रखा जाए। पुराने सिक्कों की पूजा और नए दीपकों का उपयोग श्रद्धा व्यक्त करने के तरीके हैं। इन्हें ‘सबसे अहम’ या हर घर में अनिवार्य बताने के बजाय संबंधित पारिवारिक परंपरा के रूप में समझना अधिक सटीक है। समृद्धि की प्रार्थना के साथ अपने संसाधनों की संभाल और स्वास्थ्य की देखभाल भी जीवन में स्थान रखती है।