धर्म : हिंदू धर्म में भाद्रपद मास की पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा करने की परंपरा है। कई परिवारों में पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा भी सुनी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूर्णिमा व्रत करने और कथा सुनने से मन को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। पूर्णिमा व्रत की परंपरा से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें धनेश्वर ब्राह्मण और उसकी पत्नी रूपवती की कथा प्रमुख रूप से सुनाई जाती है।
भाद्रपद पूर्णिमा व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में रत्नों से संपन्न कार्तिका नाम की एक नगरी थी। इस नगरी पर चंद्रहास नाम के राजा का शासन था। इसी नगर में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहता था। दोनों के पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी और उनका जीवन सुखपूर्वक चल रहा था।इसके बावजूद पति-पत्नी के जीवन में एक बड़ा दुख था। विवाह के काफी समय बाद भी उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। इस कारण दोनों हमेशा चिंतित रहते और ईश्वर से संतान प्राप्ति की प्रार्थना किया करते थे।एक दिन उस नगर में एक योगी पहुंचे। योगी रोज नगर के अलग-अलग घरों से भिक्षा मांगते थे, लेकिन वह धनेश्वर के घर से भिक्षा स्वीकार नहीं करते थे। यह बात धनेश्वर को परेशान करने लगी। एक दिन उसने योगी से इसका कारण पूछने का निश्चय किया।
धनेश्वर ने योगी के सामने अपनी व्यथा रखी और पूछा कि आखिर वह उसके घर से भिक्षा क्यों नहीं लेते। कथा के अनुसार योगी ने उसे संतानहीन होने से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर इसका कारण बताया। धनेश्वर ने योगी से प्रार्थना की कि उसे कोई ऐसा उपाय बताया जाए जिससे उसके घर में भी संतान का जन्म हो सके।योगी ने धनेश्वर को देवी की आराधना करने और तपस्या करने का मार्ग बताया। धनेश्वर ने उनकी बात स्वीकार की और पूरी श्रद्धा के साथ देवी की उपासना करने लगा। कई दिनों तक पूजा और तपस्या करने के बाद देवी उससे प्रसन्न हुईं।कथा के अनुसार देवी ने धनेश्वर को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया, लेकिन साथ ही बताया कि उसके भाग्य में होने वाली संतान अल्पायु होगी। यह सुनकर धनेश्वर चिंतित हो गया। उसने देवी से अपने पुत्र की रक्षा का उपाय पूछा।
तब उसे पूर्णिमा व्रत के महत्व के बारे में बताया गया। धार्मिक कथा में पूर्णिमा के व्रत, पूजा और पुण्य कर्मों को संतान के कल्याण से जोड़ा गया है। इसके बाद धनेश्वर और उसकी पत्नी ने श्रद्धा के साथ व्रत और धार्मिक अनुष्ठान करने का संकल्प लिया।समय बीतने पर उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। संतान मिलने से परिवार में खुशी छा गई। लेकिन देवी की ओर से बताए गए अल्पायु के संकेत को ध्यान में रखते हुए माता-पिता उसके भविष्य को लेकर चिंतित भी रहते थे।
कथा में आगे पुत्र की आयु पर संकट आने और धार्मिक पुण्य, व्रत तथा ईश्वर की कृपा से उसकी रक्षा होने का वर्णन मिलता है। इसी प्रसंग के माध्यम से पूर्णिमा व्रत की महिमा बताई जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस कथा के विवरण और पात्रों से जुड़े प्रसंग कुछ अंतर के साथ भी सुनाए जाते हैं।धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्णिमा व्रत केवल किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि संयम और भक्ति का भी प्रतीक माना गया है। इस दिन व्रती सुबह स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान शिव-पार्वती या चंद्रदेव की पूजा करते हैं।
दिनभर उपवास के साथ भगवान का स्मरण, मंत्र-जप और कथा श्रवण किया जाता है। शाम को चंद्रमा के दर्शन होने पर अर्घ्य देने की परंपरा भी प्रचलित है। कई घरों में इसी दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा का आयोजन किया जाता है।पूर्णिमा के दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, चावल, तिल या दूसरी उपयोगी वस्तुओं का दान करते हैं। हालांकि व्रत और पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों तथा पारिवारिक परंपराओं के अनुसार बदल सकती है।
भाद्रपद पूर्णिमा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसके बाद पितृपक्ष की शुरुआत से जुड़ी धार्मिक परंपराएं आती हैं। इस अवसर पर बहुत से श्रद्धालु स्नान, दान और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं।पूर्णिमा व्रत से जुड़ी कथाओं का मूल संदेश श्रद्धा, संयम, दान और ईश्वर में विश्वास से जुड़ा है। धनेश्वर और रूपवती की कथा में भी संतान की कामना, तपस्या, व्रत और धार्मिक आस्था के माध्यम से इसी संदेश को प्रस्तुत किया गया है।
धार्मिक ग्रंथों और अलग-अलग परंपराओं में पूर्णिमा व्रत की एक से अधिक कथाएं प्रचलित हैं। भाद्रपद पूर्णिमा पर धनेश्वर ब्राह्मण की कथा के अलावा धर्मदत्त की कथा भी सुनाई जाती है। भविष्य पुराण से संबंधित द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत परंपरा में पूर्णिमा व्रत के विशेष महत्व का उल्लेख मिलता है।ऐसे में भाद्रपद पूर्णिमा पर श्रद्धालु अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार व्रत रख सकते हैं, भगवान की पूजा कर सकते हैं और पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ या श्रवण कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इसे परिवार के कल्याण, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक शांति की कामना से किया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत माना गया है।
Tags: