Puri Rath Yatra ज्योतिष न्यूज़: रथ यात्रा, जिसे रथ उत्सव या श्री गुंडिचा यात्रा के नाम से भी जाना जाता है, प्रतिवर्ष ओडिशा के प्राचीन शहर पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के पास आयोजित की जाती है। हर साल, दुनिया भर से लाखों भक्त भगवान जगन्नाथ को समर्पित इस भव्य जुलूस में शामिल होते हैं। रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ की अपने भाई-बहनों भगवान बलराम और सुभद्रा देवी के साथ उनके मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा
का प्रतीक है।
रथ यात्रा की अवधि और समय
विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा सामान्यतः 9 दिनों तक चलती है। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होती है और नवें दिन 'बहुदा यात्रा' (वापसी यात्रा) के साथ संपन्न होती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर जाते हैं और वहां 7 दिन विश्राम करते हैं।
तीन भव्य रथों का निर्माण
प्रतिवर्ष तीन रथों का निर्माण किया जाता है, और हजारों भक्त रस्सियों से खींचे जाने वाले भव्य लकड़ी के रथों पर सवार होकर विचरण करते हैं। प्रत्येक देवता का अपना अनूठा रथ होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, भगवान बलदेव को तालध्वज और देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलना कहा जाता है।
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा: एक बार देवी सुभद्रा ने अपने भाइयों से पुरी नगर घूमने की इच्छा जताई उनकी यह इच्छा पूरी करने के लिए तीनों देव भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले थे. मान्यता है कि इसी यात्रा के दौरान वे अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर गए थे, जहाँ उन्होंने सात दिनों तक विश्राम किया था।तभी से हर साल यह परंपरा निभाई जा रही है।
रथ यात्रा 2026 की तिथियां
रथ यात्रा नौ दिनों का उत्सव है जो विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई (गुरुवार) से शुरू होकर 24 जुलाई (शुक्रवार) तक चलेगी।देवताओं की जगन्नाथ मंदिर तक वापसी यात्रा भी शामिल है जिसे 'बहुदा रथ यात्रा' कहा जाता है।
धार्मिक महत्व
रथ यात्रा उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन मनाया जाता है, जो जून या जुलाई के महीने में पड़ता है। यह भगवान जगन्नाथ की करुणा और कृपा प्राप्त करने की एक भव्य यात्रा है, जहाँ वे सभी को आशीर्वाद देने के लिए अपने गर्भगृह से बाहर आते हैं। इस दौरान, पुरी के महाराजा भगवान जगन्नाथ की सेवा में विधिपूर्वक सफाई करते हैं।
रथ यात्रा की उत्पत्ति
रथ यात्रा का आरंभ तब हुआ जब भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा के साथ द्वारका से कुरुक्षेत्र आए। द्वापर युग में सूर्य ग्रहण के अवसर पर जब कृष्ण, बलराम और सुभद्रा कुरुक्षेत्र गए, तो वृंदावन की गोपियां वहां पहुंचीं। प्रेमवश गोपियों ने उनके रथ से घोड़े हटाकर खुद रथ को खींच लिया था। इस भाव को रथ यात्रा के दौरान रथ खींचने की परंपरा से जोड़ा जाता है। भक्तों के लिए यह महज एक उत्सव नहीं है। यह गहन आध्यात्मिक भावनाओं का त्योहार है, जिसमें भगवान कृष्ण की पूजा भगवान जगन्नाथ के रूप में की जाती है। यह त्योहार पिछले 5,000 वर्षों से मनाया जा रहा है। रथ यात्रा भगवान और उनके भक्तों के बीच प्रेमपूर्ण संबंध का प्रतीक है।
रथों की विशेषताएं
रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण भव्य और भव्य रूप से सजाए गए लकड़ी के रथ हैं, जिनका निर्माण हर साल नए सिरे से किया जाता है। प्रत्येक रथ अपने आप में अनूठा होता है।
• नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ का रथ): 16 पहिए, लाल और पीले रंग
• तलध्वज (भगवान बलभद्र का रथ): 14 पहिये, नीला और लाल
• दर्पदलन (देवी सुभद्रा का रथ): 12 पहिये, काले और लाल
इन रथों को भक्त मोटी रस्सियों से खींचते हैं, जो एकता, भक्ति और आत्मा के ईश्वर से जुड़ाव का प्रतीक है।
आध्यात्मिक मान्यता
मोक्ष प्राप्ति का मार्ग: पुराणों (जैसे स्कंद पुराण) के अनुसार, रथ के दर्शन मात्र से या रथ की रस्सियों को खींचने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह निष्काम कर्मयोग का प्रतीक है।
दिव्य सुलभता: आमतौर पर देवता मंदिर के गर्भगृह में विराजते हैं, लेकिन इस यात्रा के दौरान भगवान स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए बाहर आते हैं।
पौराणिक मान्यता: यह उत्सव भगवान कृष्ण की वृंदावन यात्रा की याद दिलाता है। गुंडिचा मंदिर को भगवान की जन्मस्थली या 'मौसी का घर' माना जाता है।
सामाजिक महत्व
जाति-पाति और ऊंच-नीच का अंत: रथ यात्रा सामाजिक समानता का सबसे बड़ा उदाहरण है। इसमें शामिल होने वाले सभी भक्त, चाहे किसी भी जाति या वर्ग के हों, बिना किसी भेदभाव के मिलकर रथ की विशाल रस्सियों को खींचते हैं।
सर्वसमावेशी संस्कृति: यह त्योहार मानवता और भाईचारे का संदेश देता है, जहाँ सभी भक्त भगवान के दरबार में एक समान होते हैं।
Tags: