ज्योतिष न्यूज़ : गणेश उत्सव की समाप्ति का समय भक्तों के लिए भावुक और श्रद्धा से भरा होता है। कई दिनों तक घर और पंडाल में विराजमान रहने के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा का विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विसर्जन भगवान गणेश के अपने धाम यानी कैलाश पर्वत लौटने का प्रतीक माना जाता है। भक्त उन्हें अगले वर्ष फिर से आने का निमंत्रण देते हुए श्रद्धा और भावनाओं के साथ विदाई देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणपति विसर्जन के बाद की एक परंपरा भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है? विसर्जन स्थल से घर लौटने के बाद परिवार के सदस्य सबसे पहले आरती करते हैं। कई घरों में इस परंपरा का विशेष रूप से पालन किया जाता है और इसे गणेश उत्सव की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है। आखिर विसर्जन के बाद घर लौटते ही आरती करने की परंपरा क्यों है? इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं और आध्यात्मिक भावनाएं जुड़ी हैं? आइए जानते हैं गणेश विसर्जन के बाद घर लौटते ही आरती क्यों की जाती है, इस परंपरा का धार्मिक महत्व क्या है और इसके पीछे कौन-कौन सी मान्यताएं प्रचलित हैं।
विसर्जन के बाद आरती करने के पीछे की मान्यताएं
मूर्ति का विसर्जन, ऊर्जा नहीं
हिंदू मान्यता के अनुसार, गणपति विसर्जन में केवल मिट्टी या अन्य तत्वों से बनी मूर्ति का जल में विलय होता है, लेकिन भगवान गणेश की दिव्य ऊर्जा और आशीर्वाद घर में स्थायी रूप से बना रहता है। घर लौटकर आरती करना इसी बात का प्रतीक है कि भले ही स्थूल रूप (मूर्ति) विदा हो गया हो, लेकिन उनकी कृपा और शक्ति भक्तों के हृदय व घर में सदा विराजमान रहती है।
उत्सव का औपचारिक समापन
गणेशोत्सव के दौरान प्रतिदिन सुबह-शाम आरती करने की परंपरा निभाई जाती है। विसर्जन के बाद घर लौटकर आरती करना इस पूरे उत्सव चक्र को विधिवत रूप से पूर्ण करने का प्रतीक माना जाता है। इसे उत्सव की अंतिम कड़ी के रूप में देखा जाता है, जिससे पूजा-अनुष्ठान की निरंतरता और मर्यादा बनी रहती है।
आभार व्यक्त करने की परंपरा
मान्यता है कि भगवान गणेश दस दिनों (या जितने भी दिन प्रतिमा स्थापित रहती है) तक घर में विराजमान रहकर परिवार की रक्षा करते हैं और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। विसर्जन के बाद की जाने वाली आरती भगवान के प्रति आभार व्यक्त करने और उनसे अगले वर्ष पुनः घर आने की प्रार्थना करने का माध्यम मानी जाती है। इसी वजह से "गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" जैसे जयकारे भी लगाए जाते हैं।
घर की शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा
विसर्जन स्थल पर जाने के दौरान भीड़-भाड़, जल स्रोत और बाहरी वातावरण के संपर्क में आने के बाद घर लौटकर आरती करना घर के वातावरण को पुनः शुद्ध और पवित्र करने का प्रतीक माना जाता है। आरती की लौ और धूप-दीप से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो नकारात्मकता को दूर करने में सहायक मानी जाती है।
भगवान की निरंतर उपस्थिति का विश्वास
कई धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यह आरती इस विश्वास को दृढ़ करने के लिए की जाती है कि गणपति बप्पा भले ही मूर्ति रूप में विदा हो गए हों, लेकिन वे हर घर और हर भक्त के मन में हमेशा विराजमान रहते हैं। यह आरती भगवान को यह संदेश देने जैसी मानी जाती है कि उनकी उपस्थिति घर में बनी रहे।
गणेश जी की आरती
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
एक दंत दयावंत,
चार भुजा धारी .
माथे सिंदूर सोहे,
मूसे की सवारी ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
पान चढ़े फल चढ़े,
और चढ़े मेवा .
लड्डुअन का भोग लगे,
संत करें सेवा ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
अंधन को आंख देत,
कोढ़िन को काया .
बांझन को पुत्र देत,
निर्धन को माया ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
‘सूर’ श्याम शरण आए,
सफल कीजे सेवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो,
शंभु सुतकारी .
कामना को पूर्ण करो,
जाऊं बलिहारी ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा ॥
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