धर्म डेस्क:  नवरात्रि की महानवमी मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की आराधना को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी की उपासना से ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन श्रद्धालु पूजन, मंत्र जप, आरती, हवन और कन्या पूजन करते हैं। मां सिद्धिदात्री को सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। नवरात्रि के समापन से जुड़े इस अनुष्ठान में श्रद्धा और कन्याओं के सम्मान को विशेष महत्व दिया जाता है। 

महानवमी की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग विवरण के अनुसार, नवमी तिथि 19 अक्टूबर 2026 को सुबह 10 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। इस बार 19 अक्टूबर को अष्टमी और महानवमी से संबंधित अनुष्ठान किए जा रहे हैं। उदया तिथि और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कुछ श्रद्धालु 20 अक्टूबर को नवमी पूजन करेंगे।
19 अक्टूबर के प्रकाशित पंचांग में अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक बताया गया है। यह समय नगर के अनुसार बदल सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि करके पूजा का समय चुनें। नवमी तिथि में पूजन करने वाले उसके आरंभ का ध्यान रखें। 
मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल साफ करें। चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा अथवा मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा या तस्वीर रखें। दीपक जलाकर देवी का ध्यान करें और पूजन का संकल्प लें।
मां को रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें। अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा अथवा देवी स्तुति का पाठ कर सकते हैं। मंत्र जप के बाद आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें। हवन की परंपरा हो तो उचित विधि और अग्नि सुरक्षा के साथ अनुष्ठान संपन्न करें। 
देवी का सरल मंत्र और भोग
मां सिद्धिदात्री का प्रचलित मंत्र है—
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।
श्रद्धालु सुविधानुसार इस मंत्र का जाप कर सकते हैं। पूजन में साफ-सफाई से तैयार सात्विक भोजन अर्पित करें। प्रचलित परंपराओं में मां को तिल से बने पदार्थ, फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। विभिन्न परिवारों में भोग की परंपरा अलग हो सकती है। इसलिए अपने घर की मान्य परंपरा का अनुसरण करें। भोग लगाने के बाद प्रसाद परिवार और अन्य श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। www.aajtak.in
मां सिद्धिदात्री की पावन व्रत कथा
एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने सिद्धियों की प्राप्ति के लिए आदिशक्ति की उपासना की थी। देवी ने मां सिद्धिदात्री के स्वरूप में उन्हें सिद्धियां प्रदान कीं। मान्यता है कि देवी की कृपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवीमय हुआ और उनका अर्धनारीश्वर स्वरूप प्रकट हुआ।
यह कथा शिव और शक्ति की अभिन्नता का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक परंपरा में मां सिद्धिदात्री की आराधना साधक को पूर्णता और आध्यात्मिक ज्ञान की ओर प्रेरित करने वाली बताई गई है। कथा के अलग-अलग वर्णन मिलते हैं; इसे धार्मिक विश्वास के रूप में पढ़ा जाता है। 
कन्या पूजन और व्रत पारण
देवी पूजन के बाद छोटी कन्याओं को आदरपूर्वक आमंत्रित करें। परंपरानुसार उनके चरण धोकर तिलक लगाएं और भोजन कराएं। सामान्यतः हलवा, पूड़ी और काले चने परोसे जाते हैं। भोजन के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार देकर सम्मानपूर्वक विदा करें।
व्रत पारण का समय पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है। कुछ लोग नवमी पूजन के बाद और कुछ दशमी को व्रत खोलते हैं। स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण करें।

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