नवरात्रि समापन की तैयारी, जानें साख विसर्जन और पूजन की सही तिथि
दुर्गाष्टमी, 20 को नवमी
जम्मू: शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिनों में दुर्गाष्टमी और महानवमी की तारीखों को लेकर श्रद्धालुओं के बीच असमंजस है। इसकी वजह अष्टमी तिथि का एक दिन शुरू होकर अगले दिन तक रहना है। जम्मू में सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि के आधार पर दुर्गाष्टमी सोमवार, 19 अक्टूबर और महानवमी मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाने की जानकारी दी गई है। श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री के अनुसार, श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुरूप इन दिनों कन्या पूजन और साख विसर्जन कर सकते हैं।
तिथि शुरू होने का समय और पर्व मनाने की तारीख हमेशा एक जैसी नहीं होती। जम्मू के दैनिक पंचांग में 18 अक्टूबर को सूर्योदय के समय सप्तमी बताई गई है, जो सुबह लगभग 8 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। इसके बाद अष्टमी शुरू होगी। इस कारण कैलेंडर में 18 अक्टूबर को अष्टमी का आरंभ दिखाई देने के बावजूद सूर्योदय व्यापिनी अष्टमी का अनुष्ठान अगले दिन किया जाता है। अलग धार्मिक परंपराओं में पर्व निर्धारित करने की पद्धति भिन्न होने से तारीखों में अंतर भी दिखाई दे सकता है।
स्थानीय ज्योतिषाचार्य की बताई गणना के अनुसार, अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह करीब 8 बजकर 29 मिनट से 19 अक्टूबर की सुबह लगभग 10 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसके बाद नवमी आरंभ होगी और 20 अक्टूबर को दोपहर करीब 12 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। विभिन्न पंचांगों की गणना में एक-दो मिनट का अंतर सामने आता है। इसलिए यहां दिए गए समय को उसी स्थानीय गणना के संदर्भ में समझें। अष्टमी का पूजन करने वाले परिवार 19 अक्टूबर की सुबह तिथि रहते अनुष्ठान की योजना बना सकते हैं।
नवमी पर कन्या पूजन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए स्थानीय परंपरा के अनुसार 20 अक्टूबर का दिन बताया गया है। उस दिन सुबह नवमी तिथि रहेगी। हालांकि, तिथि की उपलब्ध अवधि को पूरा का पूरा विशेष शुभ मुहूर्त नहीं समझना चाहिए। कन्या पूजन और साख विसर्जन के लिए अलग, सर्वमान्य निश्चित समयखंड की पुष्टि उपलब्ध स्थानीय जानकारी में नहीं दी गई है। अपने घर की परंपरा के अनुसार सटीक समय स्थानीय पुरोहित से निर्धारित कराना बेहतर रहेगा। विशेष रूप से किसी दूसरे शहर का चौघड़िया जम्मू पर सीधे लागू नहीं करना चाहिए।
धार्मिक परंपरा में कन्या पूजन के दौरान बालिकाओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान दिया जाता है। कुछ परिवार अष्टमी पर और कुछ नवमी पर यह अनुष्ठान करते हैं। सामान्य विधि में घर तथा पूजन स्थल की सफाई के बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं। देवी की पूजा और भोग के बाद कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाकर चरण धोए जाते हैं, माथे पर तिलक लगाया जाता है और मौली बांधी जाती है। परिवारों की विधि में स्थानीय अंतर हो सकते हैं।
कन्या भोज में प्रायः हलवा, पूड़ी और काले चने परोसे जाते हैं। कई घरों में खीर और फल भी दिए जाते हैं। भोजन के बाद सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, वस्त्र या पढ़ाई की सामग्री भेंट की जाती है। नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराने की परंपरा भी कई परिवारों में प्रचलित है। कन्याओं की संख्या और भेंट को लेकर अलग-अलग रीति मिलती हैं। आयोजन करते समय बच्चों की सुविधा, भोजन की स्वच्छता और किसी खाद्य पदार्थ से एलर्जी जैसी व्यावहारिक बातों का ध्यान रखें।
साख विसर्जन के लिए भी परिवार अपनी प्रचलित अष्टमी या नवमी की परंपरा अपनाते हैं। पूजन से पहले जरूरी सामग्री व्यवस्थित कर लें, ताकि अनुष्ठान जल्दबाजी में न करना पड़े। विसर्जन स्थल तक पहुंचने की व्यवस्था पहले करें और वहां लागू स्थानीय निर्देशों का पालन करें। पूजा सामग्री के साथ प्लास्टिक, पैकेट या अन्य कचरा न छोड़ें। घर में बुजुर्गों से चली आ रही विधि और पुरोहित के मार्गदर्शन में सामंजस्य रखना तारीखों को लेकर अनावश्यक भ्रम कम करने में मदद करेगा। जम्मू की स्थानीय जानकारी में विजयदशमी 20 अक्टूबर और शस्त्र पूजन दोपहर 12 बजकर 52 मिनट के बाद बताया गया है। यह समय शस्त्र पूजन से संबंधित है; इसे कन्या पूजन या साख विसर्जन का समय न मानें। नवरात्रि के व्रत का पारण भी अपने परिवार की विधि और संबंधित अनुष्ठान पूरे करने के अनुसार करें।