Janki Jayanti ज्योतिष न्यूज़ : सनातन धर्म में कई सारे व्रत त्योहार पड़ते हैं और सभी का अपना महत्व होता है लेकिन जानकी जयंती को बेहद ही खास माना जाता है। इसे सीता अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर राजा जनक को सीता जी की प्राप्ति हुई थी और जनक ने देवी सीता को अपनी संतान के रूप में स्वीकार किया था।
जानकी जयंती के दिन भगवान श्रीराम के साथ माता सीता की पूजा और व्रत करना उत्तम माना जाता है मान्यता है कि ऐसा करने से इनकी कृपा प्राप्त होती हैं। इस साल जानकी जयंती का पर्व आज यानी 21 फरवरी दिन शुक्रवार को मनाया जा रहा है इस दिन माता सीता की विधिवत पूजा के साथ ही अगर व्रत कथा का पाठ भी किया जाए तो देवी की असीम कृपा बरसती है साथ ही अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान भी प्राप्त होता है तो आज हम आपके लिए लेकर आए हैं जानकी जयंती की व्रत कथा।
जानकी जयंती व्रत कथा—
जानकी जयंती की पौराणिक कथा के अनुसार, मिथिला नरेश राजा जनक की कोई संतान नहीं थी. वे अपनी प्रजा से बेहद प्यार करते थे. कई वर्ष तक उनके राज्य में वर्षा नहीं हुई थी. उनके राज्य में अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. तब राजा ने अपने राज्य को इस मुसीबत से बचाने के लिए पुरोहितों और मुनियों को यज्ञ करने को कहा. साथ ही स्वयं खेत जोतने का उपाय बताया.
राजा जनक ने हल पकड़ा और खेत जोतने लगे. तभी अचानक उनका हल खेत में एक जगह फंस गया और कई प्रयासों के बाद भी वो नहीं निकला. जहां हल फंसा हुआ था जब राजा जनक ने वहां की मिट्टी हटवाई तो उन्हें वहां एक कन्या मिली. जैसे ही वो कन्या पृथ्वी से निकली तो अचानक से बारिश शुरू हो गई. इस कन्या का नाम राजा जनक ने सीता रखा. उन्होंने सीता को अपनी पुत्री मान लिया.
सीता के मिथिला में आते ही वहां की खुशियां वापस आ गईं. इसके बाद से लोग सुख के साथ जीवन यापन करने लगे. शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन माता सीता राजा जनक को खेत में मिलीं थीं उस दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी. इसके बाद से ही इस तिथि को माता सीता का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है. यह दिन भक्त बेहद ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं.