वृंदावन में है नीम करोली बाबा की महासमाधि, जानें अंतिम पलों की कहानी
वृंदावन में ली थी महासमाधि
नीम करोली बाबा का नाम आते ही सबसे पहले उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम का ध्यान आता है। देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लेकिन बाबा के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान उत्तर प्रदेश का वृंदावन भी है। यहीं उनका आश्रम है और यहीं उनकी महासमाधि से जुड़ा पवित्र स्थल मौजूद है।
नीम करोली बाबा को उनके भक्त महाराजजी के नाम से भी जानते हैं। उनका मूल नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। बाबा हनुमानजी के परम भक्त माने जाते थे और उनके जीवन से जुड़े अनेक आश्रम तथा हनुमान मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था के केंद्र हैं। बाबा ने अपने जीवन का लंबा समय अलग-अलग स्थानों पर बिताया। उत्तराखंड का कैंची धाम उनके सबसे प्रसिद्ध आश्रमों में है। 1960 के दशक में स्थापित यह स्थान बाद में उनके अनुयायियों के बीच विश्व प्रसिद्ध हुआ। एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स और बाद में मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की कैंची धाम से जुड़ी यात्राओं की चर्चाओं ने भी इस स्थान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
नीम करोली बाबा के अंतिम दिनों का संबंध वृंदावन से जुड़ता है। प्रचलित जीवनी विवरणों के अनुसार सितंबर 1973 में बाबा आगरा से नैनीताल की ओर ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। सीने में तकलीफ महसूस होने के बाद उन्हें मथुरा रेलवे स्टेशन पर उतारा गया और अस्पताल ले जाया गया।
बताया जाता है कि चिकित्सकों ने उनकी स्थिति को गंभीर देखते हुए इलाज शुरू किया, लेकिन 11 सितंबर 1973 को उन्होंने शरीर त्याग दिया। उनके भक्त इस घटना को उनकी ‘महासमाधि’ के रूप में देखते हैं। इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को वृंदावन स्थित आश्रम ले जाया गया। वृंदावन आश्रम में ही उनके अंतिम संस्कार से जुड़ी प्रक्रिया संपन्न हुई और बाद में यहां उनकी महासमाधि स्थापित की गई। यही वजह है कि नीम करोली बाबा के अनुयायियों के लिए कैंची धाम के साथ वृंदावन आश्रम का भी विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
वृंदावन स्थित आश्रम में बाबा की स्मृतियों से जुड़े स्थानों के साथ हनुमानजी की उपासना का भी विशेष महत्व है। देश-विदेश से आने वाले उनके अनुयायी यहां पहुंचकर बाबा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और ध्यान-प्रार्थना करते हैं।
नीम करोली बाबा की शिक्षाओं में प्रेम, सेवा, भक्ति और जरूरतमंदों की सहायता को प्रमुखता दी जाती है। उनके नाम से जुड़े आश्रम आज भारत के अलावा विदेशों में भी मौजूद हैं। उनके कई विदेशी शिष्यों ने उनकी शिक्षाओं और अपने अनुभवों पर पुस्तकें भी लिखीं, जिनसे पश्चिमी देशों में उनकी पहचान बढ़ी। कैंची धाम भले ही नीम करोली बाबा से जुड़ा सबसे चर्चित स्थान हो, लेकिन उनके जीवन की अंतिम यात्रा को समझने के लिए वृंदावन का महत्व अलग है। यहीं उनके जीवन के अंतिम अध्याय की स्मृतियां और महासमाधि से जुड़ा स्थल मौजूद है।
बाबा के अंतिम समय से संबंधित कई कथाएं उनके भक्तों और अनुयायियों के संस्मरणों में मिलती हैं। इनमें कुछ विवरण आस्था और मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं, इसलिए उन्हें ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्यों से अलग समझना उचित है। इतना स्पष्ट है कि 11 सितंबर 1973 को मथुरा में उनके निधन के बाद वृंदावन आश्रम उनकी अंतिम यात्रा और स्मृति का प्रमुख केंद्र बना।