धर्म : हिंदू धर्म में अनंत चतुर्दशी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह पर्व भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा के लिए समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने और अनंत सूत्र धारण करने से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। अनंत सूत्र तैयार करने के लिए रेशम या सूती धागे को हल्दी से रंगकर उसमें 14 गांठ लगाने की परंपरा है। प्रत्येक गांठ का अपना धार्मिक महत्व बताया गया है।अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इसी दिन गणेश उत्सव का समापन और गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है। इसलिए देश के कई हिस्सों में इस दिन धार्मिक आयोजन और शोभायात्राएं देखने को मिलती हैं। पंचांग के अनुसार तिथि और नक्षत्र के समय में स्थान के आधार पर मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए पूजा का सटीक मुहूर्त स्थानीय पंचांग से देखना उचित माना जाता है।
शतभिषा नक्षत्र का बन रहा संयोग
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस बार अनंत चतुर्दशी के अवसर पर शतभिषा नक्षत्र का संयोग पर्व के धार्मिक महत्व को और विशेष बना रहा है। शतभिषा 27 नक्षत्रों में से एक है और ज्योतिष में इसका संबंध राहु से माना जाता है।धार्मिक मान्यता के अनुसार अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा के बाद अनंत सूत्र धारण करते हैं।
क्यों लगाई जाती हैं 14 गांठ?
अनंत चतुर्दशी की पूजा में इस्तेमाल होने वाले अनंत सूत्र का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार रेशम या सूती धागे को हल्दी में रंगकर उसमें 14 गांठ लगाई जाती हैं। धार्मिक व्याख्याओं में इन 14 गांठों को 14 लोकों से जोड़कर देखा जाता है। कुछ परंपराओं में इन्हें भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का प्रतीक माना गया है।पूजा के दौरान अनंत सूत्र को भगवान विष्णु के सामने रखकर उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद श्रद्धालु इसे अपनी बांह पर बांधते हैं। परंपरागत रूप से पुरुष इसे दाहिनी बांह और महिलाएं बाईं बांह पर धारण करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधि में कुछ अंतर भी देखने को मिल सकता है।
ऐसे तैयार करें अनंत सूत्र
धार्मिक परंपरा के अनुसार अनंत सूत्र तैयार करने के लिए साफ रेशमी या सूती धागा लिया जाता है। इसे हल्दी के घोल में डुबोकर पीले रंग का बनाया जाता है। इसके बाद इसमें 14 गांठ लगाई जाती हैं। तैयार सूत्र को पूजा के समय भगवान विष्णु के सामने रखा जाता है।पूजा पूरी होने के बाद भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए इसे बांह पर बांधा जाता है। मान्यता है कि इसे केवल धागा न मानकर भगवान के आशीर्वाद और संकल्प के प्रतीक के रूप में धारण करना चाहिए।
अनंत चतुर्दशी की पूजा विधि
अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और व्रत-पूजा का संकल्प लेते हैं। पूजा स्थान को साफ करने के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। इसके बाद फूल, फल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।पूजा में अनंत सूत्र को भी भगवान के सामने रखकर पूजा की जाती है। भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और अनंत चतुर्दशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण करने की परंपरा है। पूजा के बाद आरती की जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके बाद अनंत सूत्र धारण किया जाता है।
भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की होती है पूजा
'अनंत' भगवान विष्णु के नामों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उनका यह स्वरूप अनंत काल और सृष्टि की निरंतरता का प्रतीक है। अनंत चतुर्दशी पर श्रद्धालु भगवान विष्णु से परिवार की खुशहाली, आर्थिक स्थिरता और संकटों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।पौराणिक परंपराओं में अनंत व्रत की कथा का भी उल्लेख मिलता है। श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि श्रद्धा और नियम के साथ इस व्रत का पालन करने से जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने में भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
गणेश उत्सव का भी होता है समापन
अनंत चतुर्दशी का दिन गणेश उत्सव के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। गणेश चतुर्थी पर स्थापित की गई गणपति प्रतिमाओं का बड़ी संख्या में इसी दिन विसर्जन किया जाता है। महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में विशाल शोभायात्राएं निकाली जाती हैं और श्रद्धालु गणपति बप्पा को विदाई देते हैं।इस दौरान श्रद्धालु अगले वर्ष भगवान गणेश के दोबारा आगमन की कामना करते हैं। इस तरह अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु की आराधना और गणेश विसर्जन दोनों धार्मिक परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी पर श्रद्धा, संयम और अच्छे कर्मों के साथ पूजा करना विशेष माना जाता है। अनंत सूत्र की 14 गांठें इस पर्व की प्रमुख पहचान हैं। हालांकि पूजा की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं, इसलिए स्थानीय धार्मिक परंपरा और पंचांग के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।
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