जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए माताएं यह कठिन व्रत रखती हैं। व्रत के दौरान निर्जला रहने की परंपरा है और इसके बाद निर्धारित तिथि एवं समय पर पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जितिया व्रत में जितना महत्व पूजा और उपवास का है, उतना ही महत्व सही विधि से पारण करने का भी माना जाता है।
जितिया व्रत मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में बड़े श्रद्धाभाव से रखा जाता है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और जीवन में आने वाली परेशानियों से रक्षा की कामना करते हुए उपवास करती हैं।
पारण का अर्थ व्रत को विधिपूर्वक समाप्त करना है। जितिया का पारण अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद परंपरागत रूप से किया जाता है। पारण के समय को लेकर स्थानीय पंचांग और सूर्योदय के आधार पर अंतर हो सकता है। इसलिए व्रती महिलाओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग में दिए गए समय को देखकर ही पारण करना चाहिए। व्रत खोलने से पहले सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद पूजा स्थान को साफ कर भगवान का स्मरण किया जाता है। व्रत के दौरान पूजे गए जीमूतवाहन को प्रणाम कर संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है। पूजा पूरी होने के बाद पारण किया जाता है।
कई स्थानों पर पारण से पहले सूर्यदेव को जल अर्पित करने की परंपरा भी है। इसके बाद व्रती महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भोजन ग्रहण करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में पारण के भोजन में भी अंतर देखने को मिलता है। कहीं पारंपरिक सब्जियां और भोजन बनाए जाते हैं तो कहीं विशेष पकवान तैयार किए जाते हैं।
जितिया व्रत कठिन व्रतों में शामिल माना जाता है क्योंकि इसमें महिलाएं लंबे समय तक निर्जला रहती हैं। ऐसे में पारण के दौरान स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। लंबे उपवास के तुरंत बाद बहुत अधिक या भारी भोजन करने के बजाय पहले पानी या हल्का भोजन लेना शरीर के लिए बेहतर हो सकता है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार जितिया व्रत की कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी हुई है। कथा में उनके त्याग और जीवों की रक्षा के संकल्प का वर्णन मिलता है। इसी कारण इस व्रत को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जोड़ा जाता है।
जितिया व्रत का पारण केवल उपवास समाप्त करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूरे व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसलिए व्रती महिलाएं पूजा-पाठ के बाद निर्धारित समय में पारण करती हैं। पंचांग के अनुसार सही समय की पुष्टि कर अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत खोलना उचित माना जाता है।