Goa Diwali Celebration: भारत में दिवाली का त्योहार अलग-अलग राज्यों में अपनी खास परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। कहीं मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, तो कहीं दीप जलाकर खुशियां मनाई जाती हैं। लेकिन गोवा में दिवाली मनाने का अंदाज बेहद अनोखा है। यहां दिवाली की शुरुआत नरकासुर के विशाल पुतलों के जुलूस और उनके दहन से होती है। इस दौरान सड़कों पर रंग-बिरंगे पुतले, ढोल-नगाड़ों की आवाज और लोगों का उत्साह देखने लायक होता है। खास बात यह है कि नरकासुर के पुतलों को सूर्योदय से पहले जलाया जाता है। इसके बाद लोग पारंपरिक अभ्यंग स्नान करते हैं, कड़वे करीट फल को प्रतीकात्मक रूप से कुचलते हैं और पांच तरह के पोहे का आनंद लेते हैं।
गोवा में दिवाली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है। यहां नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी असुर नरकासुर का वध किया था। इसी विजय की खुशी में गोवा के लोग नरकासुर के पुतले बनाकर उनका दहन करते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी स्थानीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
गोवा पर्यटन विभाग के अनुसार, वर्ष 2026 में नरक चतुर्दशी 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। नरकासुर उत्सव की शुरुआत 7 नवंबर की रात से होगी और 8 नवंबर को सूर्योदय से पहले पुतलों का दहन किया जाएगा। पणजी, मडगांव, मापुसा, पोंडा और वास्को जैसे शहरों में इस परंपरा की खास रौनक देखने को मिलती है।
नरकासुर के पुतले तैयार करने का काम दिवाली से कई सप्ताह पहले शुरू हो जाता है। स्थानीय युवा और कलाकार बांस, लकड़ी, पुराने अखबार, घास, कपड़े और रंगीन कागज की मदद से विशाल पुतले बनाते हैं। कई पुतले दो मंजिला इमारत जितने ऊंचे होते हैं। इन्हें डरावने चेहरे, बड़ी आंखों, लंबे दांतों और रंग-बिरंगे परिधानों से सजाया जाता है। कई स्थानों पर नरकासुर पुतला प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं, जिनमें सबसे आकर्षक और रचनात्मक पुतले बनाने वाली टीमों को पुरस्कार दिए जाते हैं।
दिवाली से पहले की रात गोवा की सड़कों पर उत्सव जैसा माहौल रहता है। ढोल-नगाड़ों और संगीत के बीच नरकासुर के पुतलों की शोभायात्रा निकाली जाती है। कई स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर के युद्ध का प्रतीकात्मक मंचन भी होता है। इसके बाद सूर्योदय से पहले पुतलों को जलाया जाता है। मान्यता है कि नरकासुर का दहन अहंकार, अन्याय और बुराई के अंत का प्रतीक है।
पुतला दहन के बाद गोवा के घरों में अभ्यंग स्नान की परंपरा निभाई जाती है। इस धार्मिक स्नान में शरीर पर सुगंधित तेल और पारंपरिक उबटन लगाया जाता है। परिवार के सदस्य सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और नए कपड़े पहनते हैं। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। कई परिवार तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाते हैं और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
गोवा की दिवाली में एक और अनोखी परंपरा कड़वे करीट फल से जुड़ी है। स्थानीय भाषा में इसे करीट या करीत कहा जाता है। यह एक छोटा और कड़वा फल होता है। परंपरा के अनुसार, परिवार का कोई पुरुष सदस्य इसे पैर से कुचलता है। कुछ परिवारों में इसके कड़वे रस का थोड़ा स्वाद लेने की भी प्रथा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह नरकासुर के अंत और जीवन से नकारात्मकता दूर करने का प्रतीक है। इसके बाद आरती की जाती है और परिवार के सदस्य एक-दूसरे को दिवाली की शुभकामनाएं देते हैं।
गोवा में दिवाली का उत्सव पारंपरिक व्यंजनों के बिना अधूरा माना जाता है। यहां खासतौर पर पांच प्रकार के पोहे बनाए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'फोव' कहा जाता है। इस परंपरा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और उनके मित्र सुदामा की कथा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सुदामा भगवान कृष्ण के लिए पोहे लेकर गए थे। इसी कारण कई परिवारों में दिवाली के अवसर पर पोहे का विशेष महत्व माना जाता है।
पहले प्रकार के पोहे को कलयले फोव कहा जाता है। इसमें नारियल और गुड़ मिलाकर मीठा स्वाद तैयार किया जाता है। दूसरे प्रकार को दूधांतले फोव कहते हैं, जिसमें दूध और इलायची का इस्तेमाल होता है। तीसरे प्रकार में दही या छाछ के साथ पोहे बनाए जाते हैं। चौथे प्रकार के पोहे को बटाटा फोव कहा जाता है, जिसमें आलू और मसालों का इस्तेमाल किया जाता है। पांचवें प्रकार को रोसांतले फोव कहा जाता है, जिसमें नारियल के दूध और गुड़ का मिश्रण होता है। अलग-अलग परिवारों में इनकी सामग्री और बनाने के तरीके में अंतर हो सकता है।
इन व्यंजनों को तैयार करने के बाद परिवार के सदस्य भगवान को भोग लगाते हैं और फिर मिलकर भोजन करते हैं। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बीच पोहे तथा मिठाइयां बांटने की भी परंपरा है। यह उत्सव सामाजिक मेलजोल और पारिवारिक एकता का अवसर बन जाता है।
गोवा में दिवाली के दौरान घरों के बाहर रंगोली बनाई जाती है और रंगीन आकाश कंदील लगाए जाते हैं। शाम के समय मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। मंदिरों और घरों में पूजा-अर्चना के साथ त्योहार मनाया जाता है।
गोवा की यह दिवाली परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग पहचान रखती है। यहां नरकासुर दहन, अभ्यंग स्नान, करीट फल और पांच प्रकार के पोहे मिलकर उत्सव को विशेष बनाते हैं। इन परंपराओं में धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता की झलक दिखाई देती है।
इस वर्ष 7 और 8 नवंबर को गोवा पहुंचने वाले पर्यटक भी नरकासुर उत्सव की अनोखी परंपरा देख सकेंगे। हालांकि, पुतला दहन और शोभायात्रा के दौरान भीड़ तथा यातायात प्रतिबंधों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करना जरूरी होगा।