ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान, पुरी रथ यात्रा को UNESCO दर्जा दिलाने की तैयारी
पुरी रथ यात्रा को UNESCO दर्जा दिलाने की तैयारी
पुरी: ओडिशा की विश्व प्रसिद्ध पुरी रथ यात्रा को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) सूची में शामिल कराने के लिए प्रयास तेज किए जा रहे हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की इस ऐतिहासिक यात्रा को ओडिशा की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है।
सदियों पुरानी परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिश
पुरी रथ यात्रा हजारों वर्षों से चली आ रही एक अनूठी धार्मिक परंपरा है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन और रथों के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं। इस आयोजन में विशाल रथों का निर्माण, पारंपरिक अनुष्ठान और सामुदायिक भागीदारी इसकी खास पहचान है।
सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
Jagannath Temple से जुड़ी यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ओडिशा की कला, शिल्प, संगीत, लोक परंपराओं और सामाजिक एकता का भी प्रतीक मानी जाती है।
UNESCO दर्जे से मिलेगा वैश्विक मंच
यदि पुरी रथ यात्रा को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान मिलता है, तो इससे ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती मिलेगी। साथ ही, पर्यटन और स्थानीय कला परंपराओं को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
लाखों लोगों की आस्था का केंद्र
हर साल आयोजित होने वाली रथ यात्रा में देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान भगवान जगन्नाथ के रथों को खींचने को भक्त विशेष सौभाग्य मानते हैं।
संरक्षण और प्रचार पर जोर
संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परंपराओं को संरक्षित करना जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह सकें।