दुर्गा पूजा सबसे शुभ त्योहारों में से एक है, जो देवी दुर्गा को समर्पित है। पांच दिनों तक चलने वाला यह त्योहार 16 अक्टूबर को शुरू हुआ और 21 अक्टूबर, 2026 को समाप्त होगा। इस त्योहार की शुरुआत 10 अक्टूबर को महालया अमावस्या से हुई थी और इसका समापन विजयादशमी के साथ होता है। इसे मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और भारत के अन्य पूर्वोत्तर तथा दक्षिणी हिस्सों में मनाया जाता है। दुर्गा पूजा का समापन देवी की प्रतिमा को जल में विसर्जित करने के साथ होता है, और इस दौरान भक्त 'सिंदूर खेला' भी मनाते हैं। आइए, दुर्गा विसर्जन की रीतियों और 'सिंदूर खेला' के बारे में और जानें।
दुर्गा विसर्जन 2026
दुर्गा पूजा को 'दुर्गोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। बुधवार, 21 अक्टूबर को भक्त दुर्गा पूजा के आखिरी दिन 'दुर्गा विसर्जन' की रस्म निभा रहे हैं, जो देवी के वापस कैलाश लौटने का प्रतीक है। 'दुर्गोत्सव' का अर्थ है त्योहार के वे पांच दिन, जिन्हें महाषष्ठी, महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।
दुर्गा पूजा हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, खासकर बंगालियों के लिए। यह राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत का प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है। यह त्योहार देवी दुर्गा के अपने मायके (माता के घर) वापस आने का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान भव्य सार्वजनिक आयोजन किए जाते हैं, जिनमें शानदार सजावट और पंडाल देखने को मिलते हैं। 'द्रिक पंचांग' के अनुसार, शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
विजयादशमी मुहूर्त और समय
विजयादशमी: बुधवार, 21 अक्टूबर, 2026
दशमी तिथि शुरू - 20 अक्टूबर, 2026 को शाम 04:20 बजे
दशमी तिथि समाप्त - 21 अक्टूबर, 2026 को शाम 05:41 बजे
रीतियां और उत्सव
महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत, बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश और अत्याचार पर न्याय की जीत का प्रतीक है। दुर्गा को एक शक्तिशाली देवी के रूप में पूजा जाता है, जो "शक्ति" या दिव्य स्त्री ऊर्जा का प्रतीक हैं। यह त्योहार महिलाओं, और विशेष रूप से मातृ-स्वरूप की शक्ति, बुद्धिमत्ता और उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सुरक्षा के प्रति सम्मान व्यक्त करता है।
सिंदूर खेला 2026
सिंदूर खेला विजया दशमी के दिन मनाया जाता है। जब देवी विदा लेती हैं, तब महिलाएं स्त्री ऊर्जा, शक्ति और मातृत्व के आनंद का जश्न मनाने के लिए 'सिंदूर खेला' में भाग लेती हैं। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और झारखंड के कई हिस्सों में, महिलाएं विजया दशमी के दिन दुर्गा पूजा पंडालों में सिंदूर खेला मनाती हैं। इस दौरान वे लाल बॉर्डर वाली पारंपरिक सफेद साड़ियां पहनती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इस उत्सव में मिठाइयां, महिलाओं द्वारा निकाली जाने वाली मंगल-ध्वनि (उलुध्वनि), शंख की गूंज और ढाक (पारंपरिक ढोल) की थाप शामिल होती है। भक्त देवी दुर्गा को विदाई देते हैं और उनसे सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
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