गुप्तेश्वर गुफा मंदिर में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग जानें रहस्यमयी कहानी
ओडिशा की रहस्यमयी गुफा में विराजे हैं गुप्तेश्वर महादेव
कोरापुट: ओडिशा का कोरापुट जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं जंगलों के बीच स्थित गुप्तेश्वर गुफा मंदिर भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। चूना पत्थर की प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित शिवलिंग को लेकर सदियों पुरानी मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय परंपरा में इसे स्वयंभू शिवलिंग माना जाता है और इस स्थान को ‘गुप्त केदार’ भी कहा जाता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार गुप्तेश्वर का अर्थ ‘Hidden God’ यानी ‘गुप्त भगवान’ है।
कोरापुट से गुप्तेश्वर की दूरी लगभग 80 किलोमीटर बताई जाती है। मंदिर घने जंगलों और प्राकृतिक पहाड़ियों के बीच स्थित है। सरकारी पर्यटन जानकारी के मुताबिक यहां तक पहुंचने के लिए करीब 200 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। प्राकृतिक वातावरण और गुफा के भीतर मौजूद चट्टानी संरचनाएं इस धार्मिक स्थल को दूसरे शिव मंदिरों से अलग बनाती हैं।
भगवान राम से जुड़ी है मान्यता
गुप्तेश्वर मंदिर की सबसे प्रसिद्ध पौराणिक मान्यता भगवान राम से जुड़ी हुई है। स्थानीय परंपरा के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ दंडकारण्य क्षेत्र से गुजर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने इस गुफा में शिवलिंग को देखा और भगवान शिव की आराधना की। इस कथा को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय धार्मिक परंपरा और लोकमान्यता के रूप में देखा जाता है।
इस क्षेत्र की पहाड़ियों को रामगिरि से भी जोड़ा जाता है। पर्यटन मंत्रालय की जानकारी में महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध काव्य ‘मेघदूतम्’ में वर्णित रामगिरि क्षेत्र से भी इस इलाके की परंपरागत संबद्धता का उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि गुप्तेश्वर में धार्मिक आस्था के साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास भी जुड़ा हुआ है।
शिकारी ने दोबारा खोजी थी गुफा
गुप्तेश्वर को लेकर एक दूसरी प्रसिद्ध कथा 17वीं शताब्दी से जुड़ी है। मान्यता है कि लंबे समय तक गुफा लोगों की नजरों से ओझल रही। बाद में एक शिकारी ने इसे खोजा और इसकी जानकारी तत्कालीन महाराजा वीर विक्रम देव तक पहुंची। राजा गुफा में पहुंचे और शिवलिंग को देखने के बाद यहां पूजा की व्यवस्था कराई। इसके बाद श्रावण महीने में पैदल तीर्थयात्रा की परंपरा भी शुरू हुई, जो आगे चलकर स्थानीय धार्मिक संस्कृति का हिस्सा बन गई।
प्राकृतिक शिवलिंग बना सबसे बड़ा आकर्षण
गुफा के भीतर मौजूद शिवलिंग प्राकृतिक चूना पत्थर की संरचना से जुड़ा है। इसे लेकर श्रद्धालुओं में मान्यता है कि इसका आकार बढ़ रहा है। भारत सरकार का पर्यटन पोर्टल भी इसे ‘ever-growing Shiva Linga’ की प्रचलित मान्यता के रूप में वर्णित करता है। हालांकि शिवलिंग के लगातार बढ़ने की धारणा धार्मिक विश्वास है, इसे स्थापित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। गुफा में लंबे समय तक पानी के प्रवाह के कारण स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट जैसी प्राकृतिक चूना-पत्थर संरचनाएं भी बनी हैं। इससे गुफा के अंदर का दृश्य रहस्यमयी और आकर्षक दिखाई देता है।
दूसरी गुफा में ‘कामधेनु’ की मान्यता
मुख्य गुफा के आसपास दूसरी प्राकृतिक गुफाएं भी मौजूद हैं। इनमें एक बड़ी स्टैलेक्टाइट संरचना को श्रद्धालु देवी कामधेनु के थन के रूप में पूजते हैं। उससे गिरने वाली पानी की बूंदों को श्रद्धालु आस्था के साथ ग्रहण करते हैं। यह परंपरा गुप्तेश्वर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
महाशिवरात्रि और सावन में उमड़ते हैं श्रद्धालु
गुप्तेश्वर मंदिर में सामान्य दिनों के मुकाबले सावन और महाशिवरात्रि पर श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। कोरापुट जिला प्रशासन के दस्तावेज में बताया गया है कि ओडिशा के अलावा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार महाशिवरात्रि के दौरान यहां दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात कही गई है। कई श्रद्धालु महाकुंड में स्नान करने के बाद भगवान गुप्तेश्वर के दर्शन करते हैं।
आस्था के साथ प्रकृति का अनूठा संगम
गुप्तेश्वर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि प्राकृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके आसपास के जंगल को जैव विविधता विरासत स्थल का दर्जा मिला है। पर्यटन मंत्रालय के अनुसार लगभग 350 हेक्टेयर में फैले इस क्षेत्र में 600 से अधिक जीव प्रजातियां और 450 से अधिक वनस्पति प्रजातियां दर्ज की गई हैं। गुप्तेश्वर गुफा मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां धर्म, लोककथा, आदिवासी परंपरा और प्राकृतिक सुंदरता एक साथ दिखाई देती है। भगवान राम से जुड़ी मान्यता, गुफा के भीतर प्राकृतिक शिवलिंग, कामधेनु से जुड़ी लोकआस्था और चारों तरफ फैले घने जंगल इसे ओडिशा के अनोखे शिव धामों में स्थान दिलाते हैं।