धर्म : पितृ पक्ष में पूर्वजों की शांति और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान करने की परंपरा है। हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष की प्रत्येक तिथि किसी विशेष दिन दिवंगत हुए पूर्वजों के श्राद्ध के लिए निर्धारित मानी जाती है। इस समय षष्ठी और सप्तमी श्राद्ध के साथ सर्वपितृ अमावस्या की तारीख को लेकर लोगों में विशेष रुचि है। वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को रहेगी। इसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है।
पंचांग के अनुसार इस वर्ष षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार को है। षष्ठी तिथि 1 अक्टूबर को दोपहर करीब 12 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 2 अक्टूबर की सुबह करीब 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। मान्यता है कि जिन पूर्वजों का निधन किसी भी पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध पितृ पक्ष की षष्ठी पर किया जाता है।
इसके बाद सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को किया जाएगा। सप्तमी तिथि 2 अक्टूबर को सुबह करीब 10 बजकर 15 मिनट से शुरू होकर 3 अक्टूबर की सुबह करीब 7 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। जिन पूर्वजों का निधन सप्तमी तिथि पर हुआ हो, उनके लिए इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है।
पितृ पक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन सर्वपितृ अमावस्या माना जाता है। वर्ष 2026 में यह 10 अक्टूबर को पड़ रही है। अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात करीब 9 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 10 अक्टूबर की रात करीब 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। स्थान के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
सर्वपितृ अमावस्या का महत्व इसलिए भी अधिक माना जाता है क्योंकि जिन लोगों को अपने पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि मालूम नहीं होती या जो किसी कारण से संबंधित तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाए हों, वे इस दिन सभी पितरों के लिए श्राद्ध कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इसे सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का विशेष दिन माना गया है।
सर्वपितृ अमावस्या पर सुबह स्नान के बाद पितरों के नाम से तर्पण करने की परंपरा है। जल में काला तिल मिलाकर पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार पिंडदान या श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। कई लोग ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन भी कराते हैं।
इस दिन दान का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में अन्नदान को प्रमुख माना गया है। जरूरतमंद लोगों को चावल, आटा, दाल, सब्जी या तैयार भोजन दिया जा सकता है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किया गया अन्नदान पितरों की स्मृति में पुण्य कर्म माना जाता है।
काले तिल का दान भी सर्वपितृ अमावस्या पर किया जाता है। तिल का इस्तेमाल तर्पण और श्राद्ध कर्म में भी किया जाता है। इसके अलावा वस्त्र दान की परंपरा भी है। जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार धोती, कुर्ता, साड़ी या अन्य उपयोगी कपड़े दिए जा सकते हैं।
गुड़ और घी का दान भी कई परिवारों में शुभ माना जाता है। इसके साथ जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, फल या रोजमर्रा में काम आने वाली वस्तुएं दी जा सकती हैं। धार्मिक परंपराओं में दान करते समय दिखावे के बजाय श्रद्धा और सहायता की भावना को महत्व दिया जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर गाय को भोजन कराने की भी परंपरा है। कई लोग गाय को रोटी या हरा चारा देते हैं। इसके अलावा कौए और कुत्ते के लिए भी भोजन का हिस्सा निकालने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। पितृ पक्ष में पंचबलि से जुड़ी मान्यताओं के तहत विभिन्न जीवों को भोजन देने का उल्लेख मिलता है।
श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का समय विशेष माना जाता है। पंचांगों में कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल में श्राद्ध कर्म करने की परंपरा बताई जाती है। सर्वपितृ अमावस्या पर भी श्राद्ध और तर्पण का मुख्य समय दोपहर के आसपास रखा जाता है। हालांकि सही समय स्थान के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग या परिवार के पुरोहित से समय की पुष्टि की जा सकती है।
पितृ पक्ष में भोजन को लेकर भी कुछ पारंपरिक नियम माने जाते हैं। कई परिवार इस दौरान सात्विक भोजन करते हैं और श्राद्ध के दिन प्याज-लहसुन आदि से परहेज करते हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध की विधि और परंपराएं अलग हो सकती हैं।
इस तरह वर्ष 2026 में षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर, सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है। सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण, श्राद्ध, अन्नदान, तिल दान और जरूरतमंदों को वस्त्र या भोजन देने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और पूर्वजों के प्रति सम्मान के साथ किया गया कर्म ही श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य माना जाता है।