ज्योतिष न्यूज़: देशभर में छठ पूजा का पर्व बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस महापर्व को 4 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान घर से लेकर घाटों तक बेहद खास रौनक देखने को मिलती है। छठ पूजा के दौरान छठी माता और सूर्य देव की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही 36 घंटे का निर्जला व्रत किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है और संतान को स्वास्थ्य व दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार बताते हैं कि कब से शुरू होगी छठ पूजा और संध्या अर्घ्य एवं उषा अर्घ्य का क्या समय रहेगा।
नहाय खाय 2026
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर नहाय खाय की परंपरा निभाई जाती है।
चतुर्थी तिथि की शुरुआत- 12 नवंबर को शाम 06 बजकर 09 मिनट पर
चतुर्थी तिथि का समापन- 13 नवंबर को रात 08 बजकर 42 मिनट पर
वैदिक पंचांग के अनुसार, छठ पूजा की शुरुआत 13 नवंबर से होगी। इसी दिन नहाय खाय है।
खरना 2026
हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खरना का पर्व मनाया जाता है।
पंचमी तिथि की शुरुआत- 13 नवंबर को रात 08 बजकर 42 मिनट पर
पंचमी तिथि का समापन- 14 नवंबर को रात 11 बजकर 23 मिनट पर
छठ पूजा 2026 संध्या अर्घ्य डेट और टाइम
छठ पूजा के दिन तीसरे दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।
षष्ठी तिथि का समापन- 14 नवंबर को रात को 11 बजकर 23 मिनट पर
षष्ठी तिथि का समापन- 16 नवंबर को रात 2 बजे
सूर्यास्त का समय- 05 बजकर 45 मिनट पर
छठ पूजा 2026 उषा अर्घ्य डेट और टाइम
छठ पूजा का आखिरी दिन सप्तमी तिथि पर होता है इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है.
सप्तमी तिथि की शुरुआत- 16 नवंबर को रात 02 बजे
सप्तमी तिथि का समापन- 17 नवंबर को सुबह 04 बजकर 19 मिनट पर
छठ पूजा का धार्मिक महत्व
1. नहाय-खाय
यह तन और मन की शुद्धि का पहला चरण है, जिसमें स्नान के बाद सात्विक कद्दू-भात का सेवन किया जाता है।
2. खरना
दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम को षष्ठी देवी को अर्पित गुड़-चावल की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। यह आत्मिक शुद्धि का दिन है, जिसके साथ ही व्रतियों का 36 घंटे का कठिन और निर्जला व्रत शुरू होता है।
3. संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही सूर्य देव और छठी माता की पूजा-अर्चना करने का विधान है।
4. उषा अर्घ्य
आखिरी यानी चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया देने का विधान है। इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण कर पारण करते हैं और यह चार दिवसीय कठोर तपस्या पूर्ण होती है।