मित्र और शत्रु से परे: समय की परम शक्ति और स्पंदनात्मक जीवन की सूक्ष्म कला को समझना
समय की परम शक्ति और स्पंदनात्मक जीवन की सूक्ष्म कला को समझना
लोगों को दोस्त या दुश्मन का लेबल न देना ही सबसे अच्छा है। बस एक बात याद रखें: अगर आपका समय अच्छा है, तो आपका सबसे बड़ा दुश्मन भी आपकी मदद के लिए आगे आएगा। अगर आपका समय बुरा है, तो आपका सबसे अच्छा दोस्त भी दुश्मन जैसा बर्ताव करेगा। लोग दो तरह के नहीं होते; बस समय का फेर होता है। इसीलिए संस्कृत में हम कहते हैं, 'कालाय तस्मै नमः' (समय को मेरा नमन)। समय जैसा भी होगा, दुनिया में हमारे अनुभव भी वैसे ही होंगे।
लोगों की समझ और व्यवहार को आकार देने में समय की अहम भूमिका होती है। अपने आस-पास देखें, खुद को देखें। पिछले कुछ सालों में आपके विचार और राय भी बदले होंगे। आप अब वह इंसान नहीं हैं जो पाँच साल पहले थे। जब हम लोगों की बातों और कामों पर बहुत ज़्यादा ध्यान देते हैं, तो हम अपनी खुशी गँवा बैठते हैं। बातें और व्यवहार कभी भी बदल सकते हैं। अपनी खुशी को लोगों की बातों और कामों से जोड़ना समझदारी नहीं है।
कभी-कभी आप कुछ ऐसा कह देते हैं जिसका असल में कोई मतलब नहीं होता। सोचिए, अगर लोग आपकी उन बातों को पकड़कर बैठ जाएँ और उनके आगे कुछ देखें ही नहीं, तो क्या होगा? क्या आपको यह अच्छा लगेगा? बिल्कुल नहीं। आप चाहेंगे कि लोग आपको आपकी बातों से परे जाकर समझें। लेकिन क्या आप दूसरों के साथ ऐसा करते हैं? ज़्यादातर नहीं। आप दूसरों की कही बातों को सालों तक अपने दिल से लगाए रखते हैं।
हो सकता है कि उन्होंने जो कहा हो, उसका वह मतलब ही न हो। माँएँ अक्सर गुस्से में कह देती हैं, "यहाँ से दफ़ा हो जा!" लेकिन ज़रा सोचिए, अगर बच्चा सचमुच कहीं खो जाए, तो माँ का क्या हाल होगा।
आपका स्वभाव मिलनसार होना चाहिए। क्या आप किसी ऐसे इंसान के साथ काम करना चाहेंगे जो हर समय चिड़चिड़ा रहता हो? या किसी ऐसे इंसान के साथ रहना चाहेंगे जो हर समय अहंकारी या बदतमीज़ हो? अब खुद से पूछें — क्या आपके अंदर भी ये गुण हैं? क्या आप चिड़चिड़े हैं? क्या आप अहंकारी हैं? क्या आप दूसरों के साथ बदतमीज़ी करते हैं? दूसरों के कामों या बातों पर ध्यान देने के बजाय, अपने अंदर झाँकना ज़्यादा बेहतर है।