बाजार की पाठशाला: पहली बार भरने जा रहे हैं आईटीआर? रिटर्न फाइल करने से पहले जान लें ये जरूरी बातें
नई दिल्ली: अगर आप भी पहली बार इनकम टैक्स रिटर्न (आईटीआर) दाखिल करने जा रहे हैं, तो कुछ जरूरी बातों की जानकारी होना बेहद जरूरी है। आयकर विभाग ने वित्त वर्ष 2025-26 (आकलन वर्ष 2026-27) के लिए आईटीआर-1 (सहज), आईटीआर-2, आईटीआर-3, आईटीआर-4 (सुगम), आईटीआर-5 और आईटीआर-7 के ऑनलाइन फॉर्म और एक्सेल यूटिलिटी उपलब्ध करा दी है। एक्सेल यूटिलिटी की मदद से करदाता ऑफलाइन अपनी जानकारी भरकर बाद में उसे आयकर विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल पर अपलोड कर सकते हैं। वहीं, सीधे ऑनलाइन भी रिटर्न दाखिल किया जा सकता है।
इस बार बिना लेट फीस के आयकर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 तय की गई है। अंतिम समय में वेबसाइट पर अधिक ट्रैफिक, तकनीकी दिक्कतों या गणना संबंधी गलतियों से बचने के लिए विशेषज्ञ समय रहते रिटर्न दाखिल करने की सलाह दे रहे हैं।
आयकर नियमों के अनुसार, यदि आपकी कुल आय निर्धारित सीमा से अधिक है तो आपको आईटीआर दाखिल करना अनिवार्य है। इसके अलावा, यदि आपके पास भारत या विदेश में संपत्ति है, शेयर बाजार या ईएसओपी में निवेश किया है, बैंक खातों में निर्धारित सीमा से अधिक राशि जमा है, सालाना बिजली बिल 1 लाख रुपए से ज्यादा है, विदेश यात्रा पर 2 लाख रुपए से अधिक खर्च किया है या आपके कारोबार की बिक्री 60 लाख रुपए से ज्यादा है, तब भी रिटर्न दाखिल करना जरूरी हो सकता है।
आपकी टैक्स योग्य आय वेतन, बैंक एफडी के ब्याज, शेयरों से आय और अन्य स्रोतों से होने वाली कुल कमाई को जोड़कर निकाली जाती है। इसके बाद पीपीएफ, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस), जीवन बीमा, होम लोन और अन्य टैक्स बचत निवेशों पर मिलने वाली छूट को घटाया जाता है। बची हुई राशि पर आयकर की गणना की जाती है।
पुरानी और नई टैक्स व्यवस्था में से कौन-सी आपके लिए बेहतर होगी, यह आपकी आय और टैक्स बचाने वाले निवेशों पर निर्भर करता है। यदि आपने पीपीएफ, एनपीएस, बीमा, होम लोन या अन्य टैक्स सेविंग निवेश किए हैं तो पुरानी व्यवस्था फायदेमंद हो सकती है। वहीं, कम निवेश करने वाले लोगों के लिए नई टैक्स व्यवस्था बेहतर साबित हो सकती है। रिटर्न भरने से पहले ऑनलाइन टैक्स कैलकुलेटर की मदद लेना या चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लेना उपयोगी रहेगा।
पहली बार रिटर्न दाखिल करने वाले लोगों को कुछ जरूरी दस्तावेज पहले से तैयार रखने चाहिए, जिसमें पैन कार्ड, आधार कार्ड (दोनों लिंक होना जरूरी), फॉर्म-16, बैंक खाते की जानकारी, निवेश से जुड़े दस्तावेज, पीपीएफ और एनपीएस निवेश का विवरण, होम लोन इंटरेस्ट सर्टिफिकेट और बीमा प्रीमियम की रसीदें शामिल हैं। यदि आपने वित्त वर्ष के दौरान नौकरी बदली है, तो पुराने और नए दोनों नियोक्ताओं का फॉर्म-16 रखना जरूरी होगा।
फॉर्म-16 आपके नियोक्ता द्वारा जारी किया जाता है, जिसमें वेतन, टीडीएस, टैक्स छूट और कटौतियों की पूरी जानकारी होती है। वहीं, फॉर्म-26एएस और एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (एआईएस) में आपकी आय, बैंक ब्याज, डिविडेंड, शेयर लेनदेन, विदेशी लेनदेन और अन्य वित्तीय गतिविधियों का पूरा रिकॉर्ड होता है। आईटीआर भरने से पहले इन जानकारियों का मिलान जरूर करना चाहिए ताकि किसी प्रकार की गलती न हो।
रिटर्न दाखिल करते समय सही आईटीआर फॉर्म चुनना सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। वेतनभोगी व्यक्ति, जिनकी आय वेतन, एक मकान और अन्य सामान्य स्रोतों से है, वे आईटीआर-1 भर सकते हैं। जिनकी आय में पूंजीगत लाभ या एक से अधिक मकान शामिल हैं, उनके लिए आईटीआर-2 उपयुक्त है। व्यवसाय या प्रोफेशन से आय होने पर आईटीआर-3 भरना होता है, जबकि अनुमानित आय वाले कारोबारियों और पेशेवरों के लिए आईटीआर-4 निर्धारित किया गया है। यदि फॉर्म को लेकर भ्रम हो तो आयकर पोर्टल पर उपलब्ध "हेल्प मी डिसाइड" विकल्प की मदद ली जा सकती है।
केवल आईटीआर भर देना ही पर्याप्त नहीं है। रिटर्न जमा करने के बाद 30 दिनों के भीतर उसका ई-वेरिफिकेशन करना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो आपका रिटर्न अधूरा माना जा सकता है और रिफंड मिलने में देरी हो सकती है। ई-वेरिफिकेशन आधार ओटीपी, नेट बैंकिंग या इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन कोड (ईवीसी) के जरिए किया जा सकता है।
यदि कोई करदाता ऑनलाइन वेरिफिकेशन नहीं करना चाहता, तो वह आईटीआर-वी की हस्ताक्षरित प्रति डाक के माध्यम से आयकर विभाग के सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर (सीपीसी), बेंगलुरु भेजकर भी प्रक्रिया पूरी कर सकता है। यह भी रिटर्न दाखिल करने के 30 दिनों के भीतर करना जरूरी होता है।
अगर किसी कारणवश आपने पिछले वर्षों का आईटीआर दाखिल नहीं किया है, तो अब आईटीआर-यू (अपडेटेड रिटर्न) के माध्यम से पिछले चार आकलन वर्षों का रिटर्न भी दाखिल किया जा सकता है। वहीं, यदि चालू वर्ष का आईटीआर अंतिम तिथि के बाद दाखिल किया जाता है, तो नियमानुसार लेट फीस और यदि टैक्स बकाया है तो उस पर ब्याज भी देना पड़ सकता है।