नई दिल्ली: हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों पर चुनाव हुए। इसके बाद एमएलसी यानी विधान परिषद सदस्यों की भूमिका चर्चा में है। एमएलसी राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। वे सदन में जनता से जुड़े मुद्दे उठाते हैं और मंत्रियों से सवाल भी पूछ सकते हैं।
लेकिन एमएलसी का चुनाव विधायक की तरह सीधे जनता नहीं करती। इन्हें अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों और वर्गों के प्रतिनिधियों के जरिए चुना जाता है। इनके अधिकार, वेतन और सुविधाएं भी विधायकों से अलग हो सकती हैं। आइए, जानते हैं एमएलसी से जुड़ी जरूरी बातें।
चार राज्यों में चुनाव के नतीजे क्या रहे?
चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव में अलग-अलग दलों को जीत मिली।
- उत्तर प्रदेश: 11 सीटों में भाजपा ने 6 और समाजवादी पार्टी ने 5 सीटें जीतीं।
- बिहार: 8 सीटों में भाजपा-जेडीयू गठबंधन को 4 सीटें मिलीं। जनसुराज, आरजेडी और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की।
- महाराष्ट्र: 5 सीटों में महा विकास आघाड़ी ने 3 और महायुति ने 2 सीटें जीतीं।
- कर्नाटक: भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन ने चारों सीटें जीत लीं। कांग्रेस को किसी सीट पर जीत नहीं मिली।
इन नतीजों के बाद विधान परिषद और इसके सदस्यों की भूमिका पर चर्चा तेज हुई है।
एमएलसी कौन होते हैं और कैसे चुने जाते हैं?
एमएलसी का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल है। हिंदी में इन्हें विधान परिषद सदस्य कहते हैं। जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहां राज्य विधानमंडल के दो सदन होते हैं। विधानसभा निचला सदन और विधान परिषद उच्च सदन होता है। संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत किसी राज्य में विधान परिषद बनाई या समाप्त की जा सकती है। इसके लिए राज्य विधानसभा को विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है। इसके बाद संसद कानून बनाकर इस संबंध में फैसला कर सकती है।
देश के 6 राज्यों में विधान परिषद है—उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।
संविधान के मुताबिक, विधान परिषद में कम से कम 40 सदस्य होने चाहिए। सदस्यों की अधिकतम संख्या संबंधित विधानसभा के कुल सदस्यों की एक-तिहाई तक हो सकती है।
इनका चुनाव इस तरह होता है:
- एक-तिहाई सदस्य: स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि चुनते हैं।
- एक-तिहाई सदस्य: राज्य विधानसभा के विधायक चुनते हैं।
- एक-बारहवां हिस्सा: स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है।
- एक-बारहवां हिस्सा: शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है।
- एक-छठा हिस्सा: राज्यपाल नामित करते हैं। इनमें साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा और सहकारिता जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले लोग शामिल हो सकते हैं।
एमएलसी बनने के लिए क्या योग्यता चाहिए?
विधान परिषद सदस्य बनने के लिए व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना और कम से कम 30 साल की उम्र पूरी करना जरूरी है। इसके अलावा, संबंधित चुनाव और कानून के तहत तय दूसरी योग्यताएं भी पूरी करनी होती हैं। विधान परिषद एक स्थायी सदन है। इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जाता। एमएलसी का कार्यकाल 6 साल होता है और हर 2 साल में करीब एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
एमएलसी के अधिकार क्या हैं?
एमएलसी राज्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं, विधेयकों पर अपनी राय दे सकते हैं और मंत्रियों से सवाल पूछ सकते हैं। सामान्य विधेयकों पर विधान परिषद चर्चा कर सकती है और उनमें बदलाव का सुझाव दे सकती है।
हालांकि, धन विधेयक के मामले में इसकी शक्तियां सीमित हैं। धन विधेयक विधान परिषद में पेश नहीं किया जा सकता। विधानसभा से पारित होने के बाद इसे परिषद के पास भेजा जाता है। परिषद को 14 दिनों के भीतर इसे वापस करना होता है। समय पर वापस नहीं करने पर भी इसे दोनों सदनों से पारित माना जाता है। विधान परिषद मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती। एमएलसी मुख्यमंत्री या राज्य सरकार में मंत्री भी बन सकता है। इसके लिए विधानसभा का सदस्य होना जरूरी नहीं है, लेकिन संविधान के तहत निर्धारित शर्तें लागू होती हैं।
UP में एमएलसी को कितना वेतन और पेंशन मिलती है?
एमएलसी का वेतन और भत्ते हर राज्य में अलग-अलग हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में 2025 के संशोधन के मुताबिक, सदस्यों को निम्नलिखित मासिक राशि मिलती है:
- मूल वेतन: ₹35,000
- निर्वाचन क्षेत्र भत्ता: ₹75,000
- सचिवीय भत्ता: ₹30,000
इन तीनों को जोड़ने पर कुल मासिक राशि ₹1.40 लाख होती है। इसके अलावा, पात्रता और तय नियमों के अनुसार दैनिक भत्ता, दौरा भत्ता और चिकित्सा संबंधी राशि भी मिल सकती है।
उत्तर प्रदेश में एमएलसी को यात्रा से जुड़ी सुविधाएं भी दी जाती हैं। इनमें निर्धारित सीमा तक रेल यात्रा कूपन और नियमों के अनुसार हवाई यात्रा या निजी वाहन के ईंधन से जुड़े लाभ शामिल हो सकते हैं।
पूर्व एमएलसी के लिए मूल पेंशन ₹35,000 प्रति माह निर्धारित की गई है। पहले पूरे छह साल के कार्यकाल पर ₹2,000 प्रति माह अतिरिक्त पेंशन का प्रावधान है। इस हिसाब से एक पूरा कार्यकाल पूरा करने वाले सदस्य की पेंशन ₹37,000 प्रति माह हो सकती है। अतिरिक्त सेवा के लिए भी कानून में अलग प्रावधान हैं।
पात्र पूर्व सदस्यों के परिवार को उनकी मृत्यु के बाद परिवार पेंशन मिल सकती है। इसकी राशि और पात्रता संबंधित कानून की शर्तों पर निर्भर करती है।इस तरह एमएलसी राज्य की विधायी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, उनके अधिकार विधानसभा के समान नहीं हैं और वेतन, भत्ते तथा पेंशन के नियम राज्य के अनुसार बदलते हैं।