वोटर लिस्ट की जांच में किस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हुआ? चुनाव आयोग ने RTI में जानकारी देने से किया इनकार
नई दिल्ली: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों की पहचान के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की जानकारी को लेकर सवाल उठे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत मांगी गई जानकारी देने से इनकार कर दिया। आयोग ने इसके पीछे ट्रेड सीक्रेट और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़ी गोपनीयता का हवाला दिया है। हालांकि, जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मतदाता सूची की जांच के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया था या नहीं। इससे SIR प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर सवाल सामने आए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, RTI के जरिए चुनाव आयोग से पांच प्रमुख सवाल पूछे गए थे। इनमें सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन, गड़बड़ियों की पहचान करने की उसकी क्षमता, AI या मशीन लर्निंग का इस्तेमाल और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के फैसलों में उसकी भूमिका शामिल थी।
सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन बताने से इनकार करते हुए आयोग ने RTI कानून की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया। यह प्रावधान कुछ परिस्थितियों में व्यापारिक गोपनीयता, ट्रेड सीक्रेट और बौद्धिक संपदा से जुड़ी जानकारी के खुलासे से छूट देता है। आयोग ने यह भी कहा कि SIR के लिए न तो नया सॉफ्टवेयर बनाया गया और न ही नया सॉफ्टवेयर खरीदा गया।
हालांकि, उपलब्ध जवाब में इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की पहचान और उसकी तकनीकी क्षमताओं के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई।
सॉफ्टवेयर मतदाता सूची में....
RTI में पूछा गया था कि क्या सॉफ्टवेयर मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों की पहचान खुद कर सकता है। आयोग ने इसे स्पष्टीकरण मांगने वाला सवाल बताया और RTI कानून की धारा 2(f) का हवाला दिया। इसके तहत सार्वजनिक प्राधिकरण से पहले से उपलब्ध रिकॉर्ड की जानकारी मांगी जा सकती है।
AI, मशीन लर्निंग या प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स के इस्तेमाल को लेकर भी आयोग ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया। इसलिए उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि SIR में इन तकनीकों का उपयोग हुआ था या नहीं।
मतदाता सूची से नाम हटाने का अधिकार किसके पास है?
सॉफ्टवेयर से अपने आप मतदाताओं के नाम हटाए जाने की संभावना से जुड़े सवाल पर आयोग ने कहा कि नाम जोड़ने या हटाने का फैसला संबंधित क्षेत्र का निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर करता है।
आयोग ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B(1) और 13B(2) का हवाला देते हुए निर्वाचन क्षेत्र में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की व्यवस्था का उल्लेख किया। चिह्नित रिकॉर्ड की समीक्षा और मंजूरी से जुड़े सवाल पर RTI कानून की धारा 8(1)(g) का जिक्र किया गया। हालांकि, सॉफ्टवेयर की भूमिका और जांच प्रक्रिया पर विस्तृत जानकारी नहीं दी गई।
दो चुनाव आयुक्तों के पत्रों का मामला भी चर्चा में
SIR और आयोग के कामकाज को लेकर इससे पहले भी सवाल उठे हैं। RTI एक्टिविस्ट लोकेश के. बत्रा को मिले दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इन पत्रों में डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग के कामकाज और अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियां बांटने से जुड़े एक आदेश पर आपत्ति जताई गई थी। दोनों आयुक्तों का कहना था कि आदेश चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना जारी किया गया था।
दस्तावेजों के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय ने कहा कि ये पत्र पूरे चुनाव आयोग की ओर से भेजी गई आधिकारिक शिकायतें नहीं थे। इसके बाद पत्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दिए गए।
SIR की प्रक्रिया में पारदर्शिता पर बहस
SIR के दौरान इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की जानकारी सार्वजनिक नहीं किए जाने से तकनीकी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर चर्चा हो सकती है। एक ओर आयोग ने कुछ जानकारी को गोपनीय श्रेणी में रखा है, वहीं दूसरी ओर AI के इस्तेमाल और सॉफ्टवेयर की भूमिका से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब उपलब्ध नहीं है।
फिलहाल, सामने आई जानकारी से सॉफ्टवेयर के नाम, उसकी तकनीकी क्षमताओं या AI के इस्तेमाल की पुष्टि नहीं होती। इसलिए मामले को लेकर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आयोग का पूरा RTI जवाब और संबंधित दस्तावेज देखना जरूरी है।