द्रंग-द्रुंग ग्लेशियर की झील से पानी का रिसाव शुरू, ग्लेशियर के पिघलने से बढ़ रही चिंता
वैज्ञानिक कर रहे हैं रियल टाइम निगरानी.
नई दिल्ली: लद्दाख के बड़े द्रंग-द्रुंग ग्लेशियर के पास बनी झील से अब पानी रिसने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में इस झील का आकार तेजी से बढ़ा है। खतरे को देखते हुए वैज्ञानिक ग्लेशियर के पास कैंप लगाकर लगातार निगरानी कर रहे हैं। झील में पानी बढ़ने पर अतिरिक्त पानी निकालने की तैयारी भी रखी गई है।
वैज्ञानिक कर रहे हैं रियल टाइम निगरानी
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक जांस्कर इलाके में ग्लेशियर के पास कैंप कर झील पर नजर रख रहे हैं। वैज्ञानिक लगातार यह देख रहे हैं कि झील में कितना पानी है, उसकी गहराई कितनी है और ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघल रहा है।
अगर पानी का स्तर बढ़कर झील पर खतरनाक दबाव डालने लगेगा, तो इसे सुरक्षित तरीके से तोड़कर अतिरिक्त पानी बाहर निकालने की तैयारी की जाएगी। नेपाल में हाल की आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्र में ऐसी संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी और बढ़ा दी गई है।
2017 से दोगुने से ज्यादा हुआ झील का क्षेत्रफल
करीब 24 किलोमीटर लंबे द्रंग-द्रुंग ग्लेशियर के पीछे हटने के कारण उसके मुहाने पर यह प्रो-ग्लेशियर झील बनी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में झील का क्षेत्रफल करीब 16.62 हेक्टेयर था। 2023 तक यह बढ़कर 39.1 हेक्टेयर हो गया।
झील का क्षेत्रफल फुटबॉल के पांच मैदानों से भी बड़ा बताया गया है। करीब 25 साल पहले जिस जगह पर अब झील दिखाई देती है, वह बर्फ से ढकी हुई थी।
2010 के बाद शुरू हुआ झील बनने का सिलसिला
अध्ययनों के अनुसार, 2010 के बाद ग्लेशियर के पीछे हटने से उसके क्षेत्र में एक गहरी जगह बनी। इसमें ग्लेशियर से पिघलने वाली बर्फ का पानी जमा होने लगा और धीरे-धीरे झील का रूप ले लिया।
2021 में किए गए बाथिमेट्री सर्वे के दौरान झील में 5 हजार से ज्यादा जगहों पर माप लिया गया था। उस समय झील में करीब 1.8 लाख घन मीटर पानी पाया गया था। इसकी औसत गहराई 1.91 मीटर और सबसे ज्यादा गहराई 3.85 मीटर दर्ज की गई। 1971 से 2017 के बीच द्रंग-द्रुंग ग्लेशियर का आकार 13.84 प्रतिशत कम हुआ था। इसी दौरान ग्लेशियर का अगला हिस्सा करीब 925 मीटर पीछे चला गया।
ग्लेशियर के पिघलने से बढ़ रही चिंता
द्रंग-द्रुंग ग्लेशियर के तेजी से सिकुड़ने के कारण उसके मुहाने पर पानी जमा होकर एक बड़ी और अस्थिर झील बन गई है। यह झील कमजोर पत्थरों और मलबे के सहारे टिकी हुई है। इसलिए इसके अचानक टूटने का खतरा बना रहता है।
ग्लेशियर से निकलने वाले पानी में बदलाव का असर स्थानीय नदी तंत्र और जीव-जंतुओं के प्राकृतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।
लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में लोगों की जिंदगी ग्लेशियर से मिलने वाले पानी पर काफी निर्भर है। फिलहाल बर्फ तेजी से पिघलने के कारण नदियों में पानी ज्यादा दिखाई दे सकता है, लेकिन आने वाले वर्षों में जब ग्लेशियर में बर्फ कम हो जाएगी, तब गंभीर जल संकट और सूखे की स्थिति बन सकती है। इसका असर खेती, पीने के पानी और बिजली परियोजनाओं के लिए जरूरी पानी पर पड़ सकता है।