समझिए क्या होती है पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज और कैसे किया जा रहा इसका इलाज

Update: 2023-08-25 12:12 GMT
कानपुर। जीवन में हमारा स्वास्थ्य एक सबसे अहम चीज होती है. इसलिए नई-नई स्वास्थ्य चुनौतियों को समझते हुए हमें आगे बढ़ना है और खुद को स्वस्थ रखना है. दुर्लभ बीमारियों के बारे में भी समझना जरूरी है. इस साल की थीम पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज (पीकेडी) को समझना है, जिससे दुनियाभर के लोग प्रभावित हैं. इस रोग का मरीजों और उनके परिजनों पर गहरा असर होता है, ऐसे में इसके लक्षणों, इलाज और लेटेस्ट एडवांसमेंट के बारे में जानना आवश्यक है. *फोर्टिस हॉस्पिटल वसंत कुंज में नेफ्रोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट के प्रिंसिपल डायरेक्टर व नेफ्रोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉक्टर संजीव गुलाटी ने पीकेडी को लेकर विस्तार से जानकारी शेयर की।
पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज यानी पीकेडी एक आनुवंशिक बीमारी है जिसके चलते किडनी में फ्लूड भरे सिस्ट पनप जाते हैं. ये सिस्ट गुजरते वक्त के साथ-साथ बढ़ते जाते हैं जिसके कारण किडनी का साइज बढ़ने लगता है और मुश्किलें होना शुरू हो जाती हैं. जेनेटिक कारण से होने वाली पीकेडी के बारे में सबको पता होता है लेकिन इस बीमारी का साइलेंट नेचर बेहद खतरनाक है क्योंकि इसकी वजह से अंतिम चरण में ही रोग का पता चल पाता है. अलग-अलग आबादी के हिसाब से पीकेडी का खतरा फैलता है, लेकिन दुनियाभर में इस बीमारी का असर देखा गया है.
क्या होते हैं लक्षण?
पीकेडी के मामले में सबसे चुनौतीपूर्ण चीज इसकी विवेकपूर्ण प्रगति होती है. दरअसल, इसमें प्रारंभिक लक्षण आमतौर पर हल्के लगते हैं जिन्हें लोग आसानी से अनदेखा कर देते हैं. इन लक्षणों में पीठ या साइड में दर्द, सिरदर्द और पेट की परेशानी शामिल है. जैसे-जैसे अल्सर बड़े होते हैं उसके कारण हाई ब्लड प्रेशर, गुर्दे की पथरी, मूत्र पथ में इंफेक्शन यानी यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन जैसी समस्याएं भी होने लगती हैं. इन लक्षणों को समय पर पहचानना बेहद जरूरी है क्योंकि शुरुआती हस्तक्षेप से ही इस पर काबू पा जा सकता है और रिजल्ट अपने पक्ष में किए जा सकते हैं.
पीकेडी का इलाज
पीकेडी के क्षेत्र में लगातार रिसर्च हो रही है और इलाज के नए-नए मॉड्यूल सामने आ रहे हैं. इलाज के कई तरीके हैं जिनके जरिए बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है. दवाई लेना, ब्लड प्रेशर और दर्द पर कंट्रोल, खान-पान सही करना, ये वो चीजें हैं जिनकी मदद से किडनी पर दबाव कम किया ज सकता है और मरीज ऐसे करके अपने जीवन में सुधार ला सकते हैं.
पिछले कुछ सालों में मेडिकल रिसर्च के दौरान टारगेटेड थेरेपी जैसे विकल्प सामने आए हैं जिनसे मरीजों की उम्मीदें बढ़ी हैं. इन थेरेपी की मदद से सिस्ट की ग्रोथ को कंट्रोल किया जाता है और किडनी को बढ़ने से रोका जाता है जिसका फायदा ये होता है कि किडनी फेल होने जैसे खतरे कम हो जाते हैं. इसके अलावा रिजनरेटिव दवाओं की मदद से डैमेज किडनी टिशू को ठीक किया जाता है.
भविष्य में क्या होगा?
मेडिकल साइंस में लगातार एडवांसमेंट हो रहे हैं जिससे पीकेडी ट्रीटमेंट का भविष्य उज्जवल नजर आ रहा है. जीन एडिटिंग और जीन साइलेंसिंग जैसी जेनेटिक थेरेपी तकनीक के जरिए पीकेडी को बढ़ावा देने वाले जेनेटिक म्यूटेशन को ठीक किया जा सकता है. ये अप्रोच बीमारी को उसकी जड़ में ही रोक सकती है जिससे मरीजों व उनके परिजनों को लाभ मिलेगा.
इसके अलावा, मरीज की जेनेटिक प्रोफाइल के हिसाब से मेडिसिन या इलाज देना भी एक बेहतर विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इससे इलाज का असर तो बढ़ता ही है, साथ ही साइड इफेक्ट भी कम होते हैं. जैसे जैसे मेडिकल साइंस में तरक्की हो रही है, पीकेडी मरीजों के लिए ट्रीटमेंट भी उतना ही एडवांस होता चला जा रहा है.
जागरूकता बेहद जरूरी
इस साल की थीम पीकेडी रोगियों और उनके परिजनों की यात्रा के बारे में जानना है. जैसा कि हम दुर्लभ बीमारियों के बारे में बहुत गहराई से जानते-समझते हैं, वैसे ही जागरूकता बढ़ाने, रिसर्च को बढ़ावा देने और सुलभ इलाज के लिए एकजुट होना आवश्यक है. पीकेडी मरीजों की परेशानियों को समझकर और उन्हें ठीक करके हम उम्मीद का रास्ता तैयार करते हैं. इस थीम के मद्देनजर, आइए सब लोग ये याद रखें कि पीकेडी जैसी दुर्लभ बीमारी को समझने की दिशा में उठाया गया एक भी कदम उज्जवल भविष्य और स्वस्थ दुनिया के लिए है।
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